1. मुंबई पर हुए आंतकी हमले के बाद पाकिस्तान में छिपे कुख्यात अपराधी दाउद इब्राहिम को भारत को सौपने की मांग फिर नए सिरे से शुरु की गयी है। दाउद 1993 के मुंबई में हुए आतंकी हमलो का भी आरोपी है किन्तु उसे लेकर भारत करेगा। क्या? पकडे गए आतंकवादियो पर हमारा रिकार्ड लज्जास्पद रहा है। पूरी दुनिया पंद्रह वर्षो से देख रही है कि इस्लामी आतंकवादियो तथा उनकी विचार धारा व उनके समर्थको से निपटने का हममें साहस और बुद्वि नही है। कश्मीर से लेकर केरल तक यह इतनी बार और इतने विभिन्न रुपो मे हो चुका है कि हमारी स्थिति अब किसी से छिपी नही रह गई है।
भारतीय संसद पर आतंकी हमले 2001 का प्रमुख अभियुक्त मुहम्मद अफजल को सजा के बावाजूद फांसी न दिया जाना हमारी भीरुता का जीवंत प्रमाण है। सर्वोच्च न्यायालय मृत्युदंड सुना चुका है किंतु जो हो रहा है वह सब देख रहे है। अफजल न तो निर्दोष मुसलमान है जिसे पुलिस परेशान कर रही है न उसके विरुद्व पक्के प्रमाण न होने की समस्या है। फिर यह तो आतंकवादियो का कोई मजहब नही होता। परन्तु सच्चाई यह है कि आतंकवाद का धर्म इस्लाम ही है यह दुनिया में सर्व स्वीकृत हो गया है तब अफ्जल को दंड न देकर हमले दुनिया को जो संदेश दिया है वह नितांत स्पष्ट है।
2. मुहम्मद अफ़जल कोई अकेला उदाहरण नही है। उसी मामले के दूसरे प्रमुख आरोपी सैयद अब्दुल रहमान गिलानी के क्रिया कलापो पर गंभीर संदेह के बावजूद पर्याप्त प्रमाण नही होने के नाम पर उसे बरी कर दिया गया। उससे पहले मौलाना मसूद अजहर सैयद उमर शेख और मुश्ताक जरगर जैसे अत्यंत कुख्यात आतंकवादियो को भारत ने कंधार विमान अपरहण के बाद फिरौती में छोड दिया था। तब से केवल उन्ही तीनो ने भारत समेत पुरे विश्व में अनगिनत आतंकी हमले किए और सैकडो लोगो को मार डाला। उन कारनामो में न्यूयांर्क टे्रड सेंटर भारतीय संसद पर हुए हमले तथा वाल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डैनियल पर्ल को जिबह करना भी था।
अतः जब हम आतंकवादियो से निपट ही नही सकते तो एक दाउद को ही लेकर क्या करेंगे? भारत आते ही दाउद को हमारे सेक्युलरवादी और वामपंथी मानवाधिकारवादी आदि मिलकर उससे पक्ष में खडे होकर निर्दोष साबित करने में लग जायेगें। तीस्ता सीतलवाड कुलदीप नैयर महेश भटट् जैसे कथित बुद्विजीवियो की पूरी जमात के लिए दाउद एक अंडरट्रायल की मुसीबत में बदल जाएगा। जिसके मानवाधिकार की फिक्र में अनेक ज्ञात अज्ञात संगठन और शायद मानवाधिकार आयोग दुबला होने लगेगा।
फिर सलमान खुर्शीद जैसे अच्छे से अच्छे वकील दाऊद के लिए खडे होंगे और इतना तो कर ही डालेगे कि मुकदमा बरसो रेंगता रहे। इस बीच दाऊद के अंतर्राष्ट्रीय भाई बंधु उसे छुडाने के लिए किसी विमान अपहरण की योजना बनाएंगे। बंधको के लिए आंतकवादियों को छोडने की भारतीयो परंपरा वी0 पी0 सिंह से लेकर अटल बिहारी वाजपेई तक के कारण देशवासी सदैव दबाव में रहेगे। इससे अच्छा तो दाऊद पाकिस्तान में ही में ही रहे।
आतंकवादियो से निपटने के इस लचर रिकांर्ड के कारण की यह देश आतंकवादियों का आसान निशाना रहा है। पुलिस और सुरक्षा बल जितना कर भी पाते है हमारे नेता और बुद्विजीवी उस पर पानी फेर देते है। यहा तक कि पकडे गए आतंकवादियो भी बेहिचक कहते है कि यहां के नेता बहुत कमजोर है और जेहादियों से डरते है अन्यथा कोई कारण न था कि पिछले आठ वर्षों से इस्लामी आतंकवाद के किरुद्व विष्व व्यापी वातावरण बनने पर भी भारत पर जेहादी दबाव कम नही हुआ। पाकिस्तान और बांग्लादेशी से निरंतर हमें आतंकवाद का निर्यात हो रहा है। जबकि हमारे नेता मात्र खोखली बाते और अमेरिका के सामने रोना रोने और प्रमाण दिखाने में ही लाचार बने रहते है। मानो हमसे कायल और द्रवित होकर हकसी दिन वही हमारे लिए सिमी और लश्कर ए तोयबा के ठिकानो पर हमला बोल देंगे।
पिछले पंद्रह बीस वर्षों में दुनिया में आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित देश भारत है। लेकिन निरर्थक लफफाजी के अलावा हमारे नेता और बुद्विजीवी कुछ नही करते। आतंकवाद के बारे मे तथ्य बताने के काम में भी भयंकर बेईमानी है। मुंबई पर नया हमला इसलिए भी संभव हुआ कि सुरक्षा इंतजामो और जांच पड़ताल में तनिक भी कड़ाई किन्ही धर्म विशेष लोगो को नाहक परेशान रहना मान लिया जाता है। पुलिस अधिकारी से लेकर निजी क्षेत्र के अधिकारी तक सावधान रहते है कि उन पर यह आरोप न आए। नतीजा वही होता है जो हुआ। आखिर किसी के माथे पर नही लिखा होता कि वह जेहादी है। संबंधित समुदाय जेहादी को गैर जेहादी से अलग करने का काम तो नही ही करता बल्कि सबको जिदपूर्वक निर्दोष बताते रहता है। दिल्ली बाटलां हाउस की पुलिस आतंकवादी मुठभेड इसका नवीनतम उदाहरण है पूरे आजमग से पूछ लिजिए। ड तब जेहादी को गैर जेहादी से अलग पहचानने का काम कौन और कैसे करे। हमारी इस कि कर्त्तव्यविमूढता के पीछे दे्श मे प्रभावी हिंदू विरोधी सैक्युलरवाद एक प्रमुख कारण है। लगभग सभी नेताओ बुद्धिजीवियो ने जेहादी आतंकवाद के बारे में स्पष्ट लिखने बोलने का पर्याय घोषित कर दिया है। अतः जानकर लोग भी इस पर कुछ कहने में संकोच करते है। इंडियन एयरलाईस के आईसी 714 के अपहरण के बाद कांग्रेस और मीडिया के एक शक्तिषाली हिस्से ने केंद्र पर दवाब डाल था कि वह आतंकवादियो को छोड कर बंधको को छुडाए। बाद में बहुत लोगो ने कहा कि तब वे जानते ही नही थे कि मसूद अजहर या मुश्ताक जरगर कौन है अन्यथा उन्होने उन्हे छोडने की मांग न की होती। उनके अज्ञान का कारण क्या है?
क्यो मुंबई का एलीट अभी हायतौबा कर रहा है जबकि कश्मीर असम जैसे पूरे प्रान्तो के आतंकवाद केहाथ चले जाने पर भी उसे कोई चिंता न हुई? रतन टाटा तब तक क्यों चुप रहे जब तक स्वयं उनकी प्रांपटी पर हमला नही हुआ? इसी तरह सिनेमा खेल जगत आदि की नामी हस्तिया क्यो आतंकवाद के प्रति उदासीन रही? मानो यह सब देखना राजनीति वालो का काम है। तब क्या आश्चर्य कि आतंकवाद की आंच बढते बढते उनके घरो तक पहुंच गई है। सात सितारा होटल वह जगह है जहा सभी क्षेत्रो की हस्तियां रोज जुटती है और काम धाम के साथ साथ मौज मजे करती है। मुंबई में आज नामी लोगो की बयानबाजिया अपनी चिंता है देश की वह नहीं लगती। अन्यथा पिछले पंद्रह वर्षो से वे क्यों सोए हुए थे? रतन टाटा को देश के व्यापार जगत का एक कैप्टन माना जाता है। क्या कैप्टन वे लोग होते है जो केवल अपने जान माल पर आफत आने पर परेशान होते है? हमारे उच्च वर्गो की यह दशा क्यो है? क्यों वे जेहादी आतंकवाद के बारे में वह सब नही जानते जिसे जानने पर उनका व्यवहार दूसरा होता है?
इस दुरवस्था का सबसे बड़ा कारण वह सेक्युलरिज्म है जो अलकायदा को बजरंग दल और ओसामा बिन लादेन को नरेन्द्र मोदी के बराबर रखने जिद करता है। इसीलिए यहां जेहादी संगठनो पर प्रतिबंध की शर्त केरुप में विश्व हिन्दु परिषद पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग होती है। केन्द्र में विराजमान कुछ नेताओ द्वारा ऐसा रुख लेना वही चीज है जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के एक पूर्व प्रमुख ने आतंकवादियो को निमंत्रित करने की संग्या दी है। इस घातक राजनीति के कारण ही यहा जेहादी बढ़ रहे है। जब उन्हे मालूम है कि यदि उन्हे पकड़ भी लिया जाएगा तब भी पहले तो उनके मानवधिकार के लिए असंख्य प्रभावषाली लोग बचाव में रहेंगे। मुकदमा भी दृढता से नही चलेगा क्योकि आतंकवाद के मूलकारणो को दूर करने का शोर तेज होगा। फिर , अपराध के प्रमाणित हो जाने पर भी उन्हें तब तक सजा नहीं होगी जब तक बराबर में किसी कथित हिंदू आतंकवादी को भी सजा न मिले ।
हमारे बड़े लोग और शिक्षित समाज जेहादी आतंकवाद का पूरा सच नहीं जानते या जानबूझकर अनजान बने रहते हैं जिससे वे अपनेआप को सेकुलर बता सकें । इस बेइमानी का सिवाय राष्ट्रद्रोह या गद्दारी के क्या कहा जाएगा । यह आत्मघाती अग्यानता आज भी चल रही है जिसके कारण भारत के शत्रुऒं को यहां जयचंदों की पूरी फौज उपलब्ध है जो सैक्यूलरिज्म मानवाधिकार प्रगतिवाद या क्रांतिवाद के नाम पर अपने ही देश के विरूद्ध दिन रात काम करते रहते हैं । इसमें क्रांति या ह्यूमन राइट का लक्ष्य पूरा हो या न हो आतंकवादियों और भांति भांति के दुश्मनों का काम लाजवाब ढंग से होता है । उनको हर हाल में मदद देने वाले लोगों की यहां कमी नहीं ।
एसी बौद्धिकता जेहादियों के मनोबल पर क्या शानदार असर करती है हम यह समझना नहीं चाहते । किन्तु यदि हम वही झूठी बातें दुहराते रहे जो अरूधति राय व राम विलासपासवान जैसे लोग बोलते हैं इसलिए यह संकट टलेगा नहीं बल्कि और बढ़ता ही जाएगा । किसी समस्या के समाधान के लिए पहले उसे पूरी तरह पहचानना आवश्यक है ।