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चिकित्सा व्यवसाय या लूट का परवाना
 

 
 
हर लूट मुनाफाखोरी या मिलावट खोरी जैसे समाजघातकी कृत्यों के पीछे बाहरी और भीतरी दोनो कारण हुआ करते है। बाहरी तो वह जिसे जनता स्वंय देखती है या खुलें आम दिखाई पड़ता है भीतरी जिसके पीछे न्यस्त स्वार्थी तत्व ,बेईमानी सरकार और नेता कारण भूत होते है। अंग्रजो ने देश पर शासन जरूर किया, शौषण भी किया परन्तु उन्होने जनता को लूटने के लिए गिद्ध और भेड़ियों को नही सौपा-बम्वई मद्रास जैसे में खानपान के होटलो में तब कीमते क्वालिटी और क्वान्टिटी तीनो सरकार और नगरपालिका द्वारा निरधारित होती थी । यह हाल रेल्वे स्टेशनो पर भी था। पर समय जाते देश को आजादी क्या मिली उन सभी को लूट की छूट मिल गयी। नकली जनतंत्र के आड़ मे जातितत्र आया। सड़क छाप गुण्डे बदमाश माफिया तस्कर या मुनाफाखोर सभी रातोरात खादी पहने नेता बन गये। उनके दूसरी प्राशसकीय क्षमता तो नही रही परन्तु जाति के नाम द्वेशपूर्ण राजनीति आरक्षण आदि के बहाने से निजी जेबे व घर भरने की पृवत्ति शुरू हो गयी । नतीजा यह हुआ कि जनता से बेशुमार टेक्स वसूला गया और उसमें भ्रष्टाचार द्वारा सरकारी निमार्ण खरीदी कमीशन दलाली व हिस्सेदारी आदि में उनका काम चल निकला। देश के तमाम उद्योगो के लिए लायसेंन्स परमिट अनिवार्य हो गया और हर लायसेंन्स परमिट की रिश्रवत नेता मंत्री और अफसर तीनो मिलकर खाने लगे। उसके बाद बनने वाले हर माल पर या आयाती वस्तुओं पर जकात घटाना बढाना भी उनकी रिश्वत का आधार बन गया । उपरान्त बीच बीच में जब जरूरत पड़ी टूटपूंजियों नेताओं द्वारा अपनी छोंटी-मोटी या जेबी पार्टी कें लिए चुनावी धन के नाम से रूपया वस्तुओं पर भी नेता व्यवसाई कंपनियों की मिली भगत व बंदर बाट से लूट प्रवृति शुरू हो गई -हमें खिला और तू मनचाही लूट चला'' गरीब जनता को बकरा समझ कर काटते जाओ यही सिलसिला चबता जा रहा है।
अंग्रेज लाख बुरे थे परन्तु उन्होने शिक्षा स्वास्थ्य व खान पान की वस्तुओं पर शासकीय नियन्त्रण रखा। उनकें समय में स्कूलो की शिक्षा मुफत या मामुली शुल्क की हवा करती थी। प्राईवेटाईजेशन जैसी लूट परंपरा तब मान्य नही होती थी । साथ ही सरकारी स्कूलो की पढ़ाई भी अच्छे स्तर की होती थी -उन्ही स्कूलो से पढ़कर देश के नामी वकील डाक्टर वैज्ञानिक बने थें। यही बात सरकारी अस्पताल इलाज के मात्र आधार होते थें। जिनमें मरीज का दवा इलाज मुफ्त होता था उन्हे वहा पर इंजेक्षन मुफ्त मिलती थी अब सब बाजार में बिकने लगी है । काटन का पीस भी बाहर से खरीदना पड़ता है। उन दिनो गरीब और अमीर के इलाज मे फरक नही होता था फिर भी वहा दोनो के इलाज में कोई फरक नही होता था मामुली शुल्क केवल विशेष दर्जे के लिए होता था -फिर भी वहा दोनो का इलाज उत्तम दर्जे का होता था पर अब तो केवल रूपयों से धनवानो का इलाज होता हैं और गरीव बिना इलाज के सड़ते हुए मरता है । तब तक प्राइवेट दवाखानो व हास्पिटलो का प्रचलन इतना नही था अगर था ता वहां तो वहा भी इलाज के नाम लूट नही मचती थी अगर बाहर से भी खरीदना हो तो भी उन पर सरकारी नियंन्तत्र होता था ,भले ही उन पर कीमत नही छपी हो । इससे भई बड़ी बात तब सरकार के टेक्स नाम मात्र के थे ।केवल बड़े शहरो में इंकमटेक्स था - बाकी सेल्सटेक्स सर्विटेक्स या प्राफेशनल टेक्स अथवा तो शिक्षा या चिकित्सा टेक्स जैसा अलग से कुछ भी नही था। बावजूद उस शोषक अंग्रेज सरकार ने शिक्षा और स्वास्थय जैसी सेवा को अपना कर्तव्य मानकर निशुल्क चलाया। इसी तरह जहां राजाओं की रियासतें थी वहां भी ये सेवायें इसी तरह की निशुल्क थी। पर आजादी मिलते ही हमारे देश के कंगले और भ्रष्ट नेताओं ने अपनी मौजमजा या जेब भरने की प्रवृति से गिद्ध और भेड़ियो का रूप धारण कर जिन्दा इन्सानो को टैक्स और व्यवसाई लूट के लिए खुला छोड़ दिया यहां तक कि खाने की रोटी पर भी सेल्स टेक्स और सर्विस टेक्स लगने लगा है। विन्स्टन चर्चिल ने जून १९४६ की ब्रिटीश पार्लमेन्ट में साफ शव्दों मे हिन्दुस्तानी नेताओं के लिए भविष्वाणी कर दी थी -ये सब चोर डाकू है। जो वहां की गरीब जनता को लूट खाएगें -इसिलिए यह देश आजादी के लायक नही है । भले ही चर्चिल के वे शब्द तब सवार्थ प्रेरित या अपमान जनक रहे होय परन्तु समय जाते हमारे नेताओं ने चर्चिल की भविष्वाणी सत्य साबित कर दी है। जिन्होनें तब की १९४७ पुर्व की गुलामी देखी है। उनके वर्तमान देश की दशा पर उदगार - इससे तो वह गुलामी का अंग्रजी शासन हजार गुना बेंहतर था'' - हमारी राय से चर्चिल की उस कड़वी भविष्वाणी के साथ उसके चित्र जगह जगह पर लगने चाहिए ताकि जनता कम से कम उस ब्रिटिश नेता को श्रद्धान्जली देकर अपनी भूल का परिमार्जन कर सके। आजादी मिलते ही नेताओं ने खुद या उनके रिष्तेदारो ने शैक्षणिक संस्थाओं पर गिद्ध दृष्टि डाली और यह प्रचार किया कि अच्छी शिक्षा सरकारी स्कूलो में नही मिल सकती- कारण भी था आरक्षण व जाति आधार पर सिफारशी रिश्रवत से कामचोर कम अक्ल वेतनखाऊ शिक्षकों को नोकरी पर लगाया गया जिनका दोहरा रूप रहा -जो नालायक रह वे पढ़ते नही थे और जो चालाक रहे उन्होने ने टयूशन एवं स्वयं का व्यवसाय शुरू कर दिया। स्कुल वेतन और सरकारी नोकरी उनके लिये बाप कमाई का माध्यम रही बाकी कोचिग व टयूशन ऊपरी कमाई का हक हो गया। यह बीमारी परिक्षाओं में रिजल्ट फिक्सिंग के रूप में फैलती फूलती गई सरकारी टेक्सो के बावजूद नई स्कूले खोलनी कम या बंद कर दी गई ऊपर से फीस के लिए खुली लूट और दाखले के नाम लखलूट डोनेशन शुरू हो गये - आखिर मामला घी खिचड़ीवाला था। स्कूले कालेज आदि प्रत्यक्ष या परोक्ष में उन्ही नेताओं की मालीकी की रही।या वहां से उन्हे अच्छी रिश्रवत मिलती रही बाकी अधिकाश तो उन्ही की संचालित शुरू हुई। उधर हास्पिटलो का इलाज भी उसी तरह शुरू हो गया कि- सरकारी दवाखानो में दो तरह के डाक्टर भरती किये गये एक आरक्षण व जाति आधारित तो दूसरी रिष्वत द्वारा -जिनमें डोनेशन और पढ़ाई करने वाले दोनो अयोग्य और पढ़ाई करने वाले इसलिए इन दोनो की कामचोरी का दण्ड जनता को चुकाना पड़ता है तो बाहर ऊंची इलाज की कीमत को लेकर अवधी लूट कमाई को लेकर प्रायवेट हास्पिटल भी उसी तरह खुलने लगे और वहां इलाज के नाम बेफाम लूट चलने लगी कई स्थानों पर तो मरीज की गलत बीमारी या बिना बीमारी का गलत इलाज और लूट का खर्च भोगना लाचारी हो गया गरीबो की किडनियां तक बेची जाने लगी है।
बढ़ती आबादी और घटती सुबिधाओं को लेकर डाक्टरो की मांग बढ़ने लगी- सरकारी मेंडीकल कालिजो में वही जातिआधारित राजनीति को लेकर अयोग्य को प्राथमिकता और योग्य को दर दर भटकना मजबूरी हो गया है। वैसे भी स्कूलो की ऊंची फीस डोनेशन देकर शिक्षा पाने वाले जाए तो जाए कहाँ ? गरीब तो वैसे भी उच्च शिक्षा की खरचीली कल्पना से हटते गये उनके लिये तो वह दीवास्वप्न हो गईं। इस शोर्टेज के लिये लाभ उठाने उन्ही मंत्री नेताओने अपने तकनीकी निजी शिक्षण संस्थान खोल लिए - उनकी सरकारी पहुच तो थी ही इसलिए खेतों में टीन टपरा लगा बिना उपयुक्त व्यवस्था व मान्यता के वे कालेज बनाम कारखाने खुलते गये। जहां दाखले के लिए ऊंचे परसेन्टेज व ऊंची फीसे साथ में कलेजा फाड़ डोनेशन देना मजबूरी हो गई। मेडीकल कालिजो में २५ से५० लाख तक का दाखला डोनेशन या रिश्रवती लूट मनाफा खोदीकने जैसी मांग उस मुताबिक वसूले जाने लगे। दूसरी तरफ सरकार ने इस खुली लूट के लिए आंखे मूंद ली- और जो भी नये कालेज सरकार ने खोले उनमें युनानी ,होम्पोपैथी व आयुर्वेदिक-वहां की फीस की लूट और कोर्स की डिग्री के लिए ६ वर्ष तक की जबरी रगडाई।
तो यह दोहरा वेस्टेज समय धन और ईलाज का तो नही होता । पर उससे नेताओ की लूट कमाई कारखाने बंद हो जाते । इस परोक्ष लूट की जानकारी न तो जनता को है न ही विद्यार्थी को वह तो इण्टर का परिणाम आते ही नेताई कारखाने की शोध मे निकल पड़ता है कि कहाँ कम खर्चो मे उसे लूटा व काटा जाएगा। इस खुली लूट के लिए जनता अनभिज्ञ है और नेता की हिस्सेदारी ऐलोपेथी की पढ़ाईवाले इन कारखानो की कमाई मात्र गजब की रही उधर विद्यार्थी से ऊंचे प्रतिशत गुणाक यहा तक के १५ प्रतिशत वाले भी मारे मारे फिरने लगे दूसरी तरफ ५० प्रतिशत वाले मजे से जाति आरक्षण का लाभ उठाने लगे । उन्हे मन मुताबिक कालेजो मे दाखला मिल जाता है। दूसरे लोगो को प्राईवेट कालेजो दाखला २५ से ५० लाख डोनेशन देकर कोर्स लेना मजबूरी हो गया । इतनी ऊंची फीस देकर जैसे बैसे डाक्टर तो बन जाता है। परन्तु आगे की पी जी की पढ़ाई के लिए ५० लाख से एक करोड़ तक का डानेशनी भाव परोक्ष हिस्सेदारी का भाव रहा कारण कि वह लूट वे स्वंय या उनके रिष्तेदार कर रहे है अथवा तो उसमें उनकी हिस्सेदारी रहती है।
इतना रूपया खर्च कर कोई डाक्टर भी बनता तो पहली बात तो सरकरी नोकरी नही मिलती । वहा भी जाति आरक्षण का भूत और दूसरी बात एक करोड़ से अधिक खर्च कर डाक्टर करने वाले उस कथित डाक्टर को क्या मिलता ? कही कभी किसी तिकड़म से नोकरी मिल भी गई तो वहां वह अपनी अब तक की छूट की वसूली में लग जाता । इस तरह इस लूट इस लूट के पीछे स्कूली षिक्षा से लेकर कालेज तक तथा आगे पी जी तक तमाम तकनीकी शिक्षा महंगी होती गयी । अब इसे कोई भी समझ सकता है कि देश की बढ़ती आबादी और उसके अनुपात में डाक्टरो की बढ़ती हुई मांग - तो विद्यार्थियो का प्रेशर इस पढ़ाई के लिए बढ़ते गया, जिसका लाभ ऐसे मुनाफाखोर और उनकी शिक्षण संस्थाए उठाने लगी है। नतीजा हर तरह की षिक्षा ईलाज मंहगा हो गया । यहा तक युनानी आयुर्वैदिक से लेकर डेन्टल और ऐलोपेथी के इलाज यहा तक की युनानी से आयुवेदिक से लेकर फीसे बढ़ती गई । ऊपर से दवा कंपनियों ने अपनी दवाओं की किमते बेशुमार बढ़ाती वर्तमान में रामविलास पासवान ने मंत्री बनते ही दवा की कीमतो के बारो में बताया करेगे। बस काफी था दवा कंपनियों इशारा समझ गई आर चंद दिनो बाद उस भाई का मुंह बद कर दिया बजाय जीवन जरूरी दवाओं की किमतें घटने के और बढ़ गई -मरीज दोहरी मार से मरने लगे है। पहले भी दवाओं की लूट चल रही थी अब मंत्री की संतुष्टी के बाद और लूट मच गई ।एक तरफ दवा की कीमते बढ़ी तो उसकी पेकिग तादाद कम होती गई गोलियों को पेकिग दस पांच तीन और दो का सीमित हो गया। महाराष्ट्र जिसमें मंत्री ने ढेकेदार से पार्टी हरमलभाण्ड के नाम से मांगी तब इस देश क्या होगा ।
अब लेते है इतना खर्च कर जो डाक्टर प्रेक्टिस के लिए आता है उसे बढ़ी हुई बाजारी कीमतो के मुताबिक डिसपेन्सरी ,क्लिनिक, मेटरनीटी या सर्जीकल युनिट खोलने के लिए लाखो से लेकर करोड़ो तक की जगह खरीदनी होती है। जिसके लिए बैक से कर्जा लेना पड़ता है उसकी किश्ते और बढता हुआ व्याज भरना पड़ता है साथ ही उसे तत्काल शानदार जीवन जीने के लिए बंगला फलेट कार आदि मेन्टेन करना पड़ता है । शिवाय स्टाफ बिजली पानी का खर्चा अलग। दूसरी मुशकिल इस धंधे में अब कम्पीटीशन भी बढ़ गया है। जिसके कारण पेशेन्ट भेजने या बुलाने के लिए जी पी को कमाई का ४० प्रतिशत हिस्सा कट प्रक्टिस का देना होता है। शिवाय एक दो बार की शानदार गीली ( शराब व नोनवेज) पार्टी भी देनी पड़ती है। इसलिए उनके चार्जिज बेक कर्जो व निजी खर्चो के अलावा -कट प्रक्टिस '' का हिस्सा चुकाना पड़ता है ऐसी स्थिति में उनकी हालत बाहरी दिखावे व टीमटाम की अधिक रहती है। जिसके लिए उनके बेशुमार चार्जेस ,गलत जांच व गैर जरूरी सर्जरी इलाज का क्रम चल निकला है। ऊपर से दवा कंपनियों का प्रलोभन जिसमें उनकी कंपनी की मेहगीं दवाईयां लिखनेवालो को सपरिवार विदेश यात्रा का लालच दिया रहता है। तीसरा कारण जो पहले से ही जी.पी. डाक्टर अपनी चिट्ठी में लिख भेजता है कि इस पेशेन्ट रूपी 'बकरा ' हलाल हो जाता हे। उसके पास दूसरा पर्याय ही नही बचता - पहले ही डाक्टर उसे बड़ी बिमारी का खतरा बता कर डरा देते है। भला कौन आदमी मरना चाहेगा? पर मरीज के लिए-वान्सासि जीर्णानि यथा विहाय'' शाश्रवत है अन्तोगत्वा पुराना शरीर बदल कर नया धारण करना फायदे मंद लगता है। सरकारी अस्पतालो में बिलम्ब व बेपरवाही से तो बाहर प्रायवेट में अति खर्चीले इलाज से मौत ही उसका भविष्य है। अब तो ऐसे डाक्टरो ने सरकारी अस्पतालो के लिए भी -कट प्रेक्टिस '' का प्रंबध कर लिया है कंहा के पेषन्ट हमें भेजो बदले में कट प्रेक्टिस का कमीशन लो -रूपया किसे नही चाहिए ? । जिसमें वहां भी ड्रेनेज (ऐसे मरीजो को इसी शब्द से जाना जाता है) । वैसे ड्रेनेज शब्द नगरपालिका वाले कचरा गंदगी गटर हेतू उपयोग में लाते है। तो वही शब्द इन गरीव मजदूरो के लिए प्रयोग होता हे। उसी ड्रेनेज के बाद में बालिका बकरा बना गरीजको काटा जाता है। कुछ उदाहरण -इस प्रकार अपवाद भी हो सकते है।
इन तमाम डाक्टरो में चाहे वह जी.पी. करने वाला युनानी,होम्योपेथी,या आयुर्वेद वाला कोई भी रहे अपनी डिस्पेन्सरी में शानदार डेकोरेशन भीतर में डाक्टर चाहे जिस योग्य क्षमता का रहे एयर कन्डीशनर में बैटता है। तो वहां तक पहुचंने में पेशेन्ट को उस तामजाम पर लगने वाले खर्चे जिनमें अनावश्यक पेथोलाजी एक्सरे आदि की जांच के अलावा स्पेशलिस्ट के नाम चिट्ठी आदि का आभास आ ही जाता है। इसलिए वह जरूरी गैरजरूरी सर्जरी की चिट्ठीलिख अपना हिस्सा पका लेता है।
दूसरा लेते है उन डाक्टरो को - वे भी अपनी क्लीनिक बनाम डिस्पेन्सरी पर शानदार खर्चा इसलिए करते है जिससे कि पेशेन्ट पहले ही चार्जेस से भयभीत या अवगत हो जाता है। जिस तरह एक सामान्य नागरिक किसी बड़े मरेल या स्टोर्स की लाईटोशोबाजी के तमाजाम व एयरकण्डीशन आदि को देखकर डर जाता है। उसकी दशा कत्लखाने में जाने वाली प्राणी की तरह होती है जिसे देखकर ही वह विचार सहम जाता है। वे डेन्टिस्ट भी अपनी शिक्षा लूट के शिकार हुए रहते है फिर बाद के खर्चो के बोंझ में होतो है- तो अपने हर पेशेन्ट से दांत की सुरक्षा के लिए दांतो की -क्लिनिगं रूढकेनाल ओर बाद में प्रति दांत निकालने व प्रतिकेप की कीमत हजारों में वसूलते है। बहुत बार तो गैरजरूरी क्लिनिगं तो रूट केनाल इसलिए करते है कि उससे उनकी कमाई होती है उसके लिये पेशेन्ट को डरा देते है कि इससे पायोरिया होने का या तमाम दातो के जानेका डर है। उसके बाद प्रति दांत निकालने की खर्च नग गिनती द्वारा वसूला जाता है। आखिर में डेन्टर जो बनता है उसके लिए चार्जेस रेल्वे थाली की तरह सुपर स्पेशलिस्ट से लेकर साधारण मध्यम के नमूने रहते है-अंत मे बढ़िया क्वालिटी के दांत की कीमत एक बार ज्यादा लगती है परन्तु वह टिकती ज्यादा है या वह अधिक हाईजनिक या डयूरेबल होगी- उस में बदबू भी नही आएगी आदि तो इस डर से पेशेन्ट डरकर ज्यादा खर्चे के लिए तैयार हो जाता है। बाद में कभी दांत सही निकले तो ठीक है वरना खराव निकलने पर दूसरा कारण तुम्हारे जवड़े ठीक नही है वगेरहा -का देकर खराब पल्ला भाड़ देते है।
फिर आते है विशेषज्ञो पर -तो वो लोग पहली बात तो जी.पी. वाले की षिफारषी चिट्ठी के मुताबिक -सर्जरी कर देते है । उदाहरण -ई.एन.टी. स्पेशलिस्ट अपने हर पेशेन्ट के लिए दो आपरेशन एक गले का टान्सिल तो दूसरा नाक की भीतर की हड्डी का शरीर रचना के हिसाब से वैसे आपरेशन कराने से मरीज को लाभ तो कोई नही होता परन्तु हानि भी विशेष नही होती । ठीक इसी तरह पेट की साधारण बीमारी के लिए एपेन्डेक्स या गालब्लेडर या पथरी का आपरेशन कर दिया जाता है। जिसका भी पेशेन्ट को शिवाय खर्च के और कोई हानि नही होती । कई बार ऐसे पेशेन्टो को होने वाले केन्सर से भी डरा दिया जाता है तो बिचारा उस भय से कुछ भी कराने को तैयार रहता है। तीसरा गर्भवती महिलाएं के लिए सीजेरियन कराने से डाक्टरो का बिल बहुत अच्छा बन जाता है। इसलिए उसे तीन दलीलो से डराया समझाया जाता है। गर्भ में बच्चे की स्थिति सही नही होने से -बच्चा अपंग या अविकसीत हो सकता है अथवा तो जच्चा बच्चा दोनो के जीबन को खतरा है सिवाय सिजेरियन पदिति से पेन भी नही होगा योनि मार्ग भी पूर्ववत बना रहेगा -कारण जो भी सही या गलत हो औरत और उसके परिवार को तैयार होना ही पड़ता है। चौथा मामला बच्चे का ज्योतिष के ग्रहो के मुताबिक निष्चित शुभ ग्रहो जन्म देकर उसे भावी टाटा ,अम्बानी बना देगी । तो कौन माँ इस तरह के लाभ से वंचित होना चाहेगी -रूपया तो हाथ का मैल है आता जाता रहेगा। डाक्टरी साबुन से हाथ का मैल साफ होता रहेगा । हमारा मामला आजकल हार्ट का है -तो उंसमें गैरजरूरी एंजोग्राफी से लेकर बायपास तक कर दी जाती है । हमारे एक परिचित स्नेही ने बताया कि उनके एक रिश्तेदार की छाती में दर्द हुआ तो डाक्टरो ने उसकी बायपास कर दी -कुछ ही महीनो बाद पुनः दर्द उठा तो दूसरे डाक्टर के पास गया उसने फिर बाईपास की बात कही तो मरीज का कहना रहा कि आप खुद देख सकते है कि मेरा बायपास हो चुका है- तो उस डाक्टर ने जांच की रिपोर्ट धरते हुए कहा भाई साहब छाती तो चोरी गई है पर बायपास नहीं हुआ है - उसे बायपास का दुबारा खर्च करना पड़ा । महिलाओ के गर्भाशय का आपरेशन करना फिर उसकी बायोफेसी जांच आदि काराना। यह सब आम हो गया है। यह है कहने का आशय नही है कि सभी डाक्टर वैसे गलत प्रेक्टिस द्वारा पैसा बनाते है। पर आज कल वैसी मान्यताए हर डाक्टर के लिए आम बन चुकी है। अंतिम बात जांच के लिए भी हर मामूली बीमारी को जो कि साफ समझ में आ जाती है फिर भी डाक्टर उसके लिए तरह तरह की जांच कराता है जिससे पेशेन्ट को अनावष्यक खर्च होता है और डाक्टर का अपनी कटप्रेटिस का कमीशन मिल जाता है। डाक्टर प्रतिजवाब में कहता है कि आजकल हर कोई कंज्यूमर कोंर्ट में चला जाता है। तो वह यह रिस्क क्यूं ले? बात सही भी है पर यहां यह भी देखना जरूरी है कि पहले डाक्टर यानि विश्वास और श्रद्धा लोग उसे भगवान की तरह मानते थे उसके प्रति -शंका का कोंई कारण ही नही था-पर अब इस तरह की प्रेक्टिस के लिए जांच चाहे वह जरूरी भी रहे की बात आते ही पेशेन्ट के मन मे शंका का कारण ख्रड़ा हो जाता है। आज के विज्ञान ने डाक्टरी व्यवसाय में अनेक सिद्धिया हासिल की है परन्तु डाक्टरो ने पेशेन्ट का विश्वास खोकर उसे बजाय सेवा के व्यवसाय मे बदल दिया है। जिसके सही भी होते हुए शंका की नजरो से देखा जाता है।
इस तमाम बिगड़ी व्यवसथा के लिए हमारे नेता जिम्मेदार है जो टैक्स वसूल कर भी शिक्षा की सही जिम्मेदारी नही लेते । बल्कि उसे भ्रष्टाचार का साधन बना लेते है दूसरी बात दवा कंपनियों को लूट में रिश्वती हिस्सेदारी तीसरी बात माध्यम बन चुकी तीसरी बात स्कूल से लेकर कालिजो की तमाम शिक्षाएं लूट का माध्यम बन चुकी है वहां दोहरी चोहरी लूट फीस और डोनेशन चलती रहती है। तब ऐसे में बिचार उस डाक्टर को दोषी मानना सिक्के का सिर्फ एक पहलू देखना है। दांत की जिस तरह रूट के नाल देखना जरूरी है ठीक उसी तरह एक चिक्तिसा लूट की जड़ो में बेईमान नेता और उनसे जुड़ें रिश्तेदार या पार्टी हायकमाण्ड ही जिम्मेदार है। जब इस स्थिति पर कुठाराघात नही होगा तब तक इस बीमारी का इलाज केन्सर की तरह समाज को सड़ाती ,लूटती रहेगी।
प्रश्न यही कि जहां हर कोई लूट में हिस्सेदार है तो बिचारी जनता जिसे बलि का बकरा बनना पड़ता है। गरीब को इलाज से मौत सस्ती लगती है। क्या यही देश की आजादी का हश्र है? भाई चर्चिल जहां भी आपकी आत्मा हो हमारी तरफ से शांति आवेदन स्वीकार करना और यह भी देखना कि हम भारतवासियों ने आपकी उस भविष्यवाणी को अक्षर सत्य साबित कर दिखाया है। इस देश की जनता लुटने व बकरे की तरह कटने मरने की लिए ही बनी है। अपनी लूट के इन कसाईयों के हर पांच वर्ष बाद निरंतर चुनती रहती है। चाहे वे काम करे या नही -अथवा तो जेबे भरे -ऊपर से संसद में प्रष्नोत्तर हो,विकास निधी का कमीशन हो या फिर कबूतरबाजी हो - कोई भी बेईमानी ,हरामखोरी के काम से पीछे नही रहेगे फिर भी उन्हे चुनने वाली इस देश की महान जनता और दुनिया का सबसे बड़ा महान लोकतंन्त्र ? क्या कहने है- उस जनता और देश का वही भविष्य है जो कभी चर्चिल ने कहा था।
समाज प्रवाह अप्रैल २००९ से साभार
......वापिस
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