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विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा
 



                    सचमुच गोवंश द्वारा मानवता पर किए जानेवाले उपकार की कोई सीमा नहीं है। भारतीय संस्कृति का आधार भारतीय कृषि पद्धति थी तथा हमारी़ कृषि व्यवस्था का मूल आधार गोवंश था। भारतीयों ने गो को माता का आदर दिया, उसे पूजा, उसे अपने जीवनका अविभाज्य अंग समझा। अंग्रजों ने हमें गाय को एक दूध देने वाला पशु मानना सिखाया। भारतीयों ने गाय को दूध देने वाली मशीन नहीं माना था। गाय के मूत्र से कई प्रकार की औषधियां बनाई गयीं। गोमय का उपयोग खेती पर उपजाऊ क्षमता को बढ़ाने के लिए किया गया। गोदुग्ध, दही, घी, गोमय तथा गोमूत्र सभी प्रकार के यज्ञों में अत्यावश्यक बताए गए। पंचगव्य को अमृत के रूप में रूप सराहा गया। इसी कारण गो को हमारी सम्पत्ति का एक प्रमुख अंग माना गया, जिसे हम गोधन कहते हैं।
अंग्रेजों ने हमारी गो के प्रति श्रद्धा, प्रेम तथा आदर को समाप्त करना उचित समझा, क्योंकि भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के लए उनके पास दूसरा विकल्प नहीं था। कुछ हद तक उन्हें सफलता मिली। पर अब उनका षड़यंत्र उजागर हो चुका है।
भारतीय संस्कृति का आधार हमारे स्वावलम्बी, परिपूर्ण ग्रामराज्य थे । हर ग्राम में उनकी आवश्यकता के अनुसार अन्न, वस्त्र, निवास, आरोग्य, शिक्षा आदि सुविधांए उपलब्ध थी। हमारी कृषि व्यवस्था सम्पूर्ण स्वाबलम्बी थी क्योंकि हमें बीज, खाद या कीट नियंत्रक आदि सामग्री बाहर से ले जाने की आवश्यकता नहीं थी।
गुलामी के २ शतकों ने सर्वप्रथम हमारी बुद्धि भ्रष्ट कर दी। विदेशी रीति रिवाज, कपड़े, मकान, दवाइयां, शिक्षण आदि ने हमारे बुद्धिजीवी वर्ग को दुर्बल बनाया। विशेषतः भारतीय मूल्यों को कमजोर समझने को बाध्य किया। भारतीय कृषि व्यवस्था हमें पुरानी और गलत लगने लगी। जिस व्यवस्था ने हमें हजारों सालों तक सोने की चिड़िया का सम्मान दिलाया, उसी को हम कमजोर समझ बैठे। दुर्भाग्य तो यह रहा कि स्वतंत्रता के पश्चात भी हमारी मानसिक गुलामी बरकरार रहीं और हम आज भी हमारी पुरातन, स्वावलम्बी तथा पुष्ट कृषि पद्धति को कमजोर समझते हैं। कृषि व्यवस्था के मूल आधार गोवंश को नष्ट करने के लिए हम तैयार बैठे हैं। ३६००० कत्लखानों के द्वारा गोवंश नष्ट करने का प्रयास निंरतर चालू है।
आज की रासायनिको पर आधारित कृषि पद्धति हम सबको विनाश की ओर खीच रही हैं। हमारी सारी समस्याओं का वास्तविक हल गोवंश आधारित कृषि व्यवस्था में ही हैं। हमारी कृषि व्यवस्था आत्मनिर्भर बने तथा हमें किसी भी आवश्यकता के लिए बाहर न जाना पड़े ऐसी बनाना है। यह व्यवस्था भारतीय नस्ल के बीजामृत तथा जीवामृत के माध्यम से, हमारी फसलों की अन्नद्रव्यों की आवश्यकता आसानी से पूरी होती हैं। हमसे हम खर्च करके गोवंश की सहायता से की गयी कृषि हमेशा उच्च गुणवत्ता के अन्न, फल सब्जियां इत्यादि निर्माण करती है। इनको खाने से हमें किसी प्रकार के विष, टाक्सिन का सम्पर्क नहीं होता।
कृषि कार्यों के लिए बैल आवश्यक हैं। उनकी पूर्ति भारतीय वंश की नस्लों सें होती हैं। भारतीय - कृषिव्यवस्था में गो तथा बैल दोनों को अंतिम श्वास तक आदर से पाला जाता है। कारण कि उनका गोबर गोमूत्र हमारी कृषि की सर्व आवश्यकताएं पूरी करने में सक्षम हैं। गाय का दूध और गाय का बच्चा हमें गोपालन के बोनस के रूप में मिलता है।
गो विज्ञान अनुसंधान केन्द्र, नागपुर ने गोमूत्र से निर्मित कीट नियंत्रक के प्रभावशाली कृषि उत्पादन के रूप में अमेरिकी यू एस पेटेन्ट नं० ७२९७६५९ प्राप्त किया है। एक भाकड़ी ( दूध न देने वाली ) गाय २५ एकड़ खेती को समृद्ध बनाती है। उसे मारने की आवश्यकता नहीं है। हर गाँव को अपनी गोपालन की जिम्मेदारी को स्वीकारना है। सामूहिक प्रयत्नों से ही यह संभव हैं।
पंचगव्य अर्थात गोमय, गोमूत्र, दही, घी और दुग्ध पर आधारित चिकित्सा पद्धति को पंचगव्य आयुर्वेद चिकित्या पद्धति कहते हैं। एलोपैथी से होने वाले दुष्परिणाम चितांजनक हैं। ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एंटीबायोटिक दवाओं का प्रभाव सन २०२० तक अप्रभावी हो जाएगा। अब पंचगव्य चिकित्सा ही सरल, सस्ता प्रभावी उपचार है।
गोमूत्र औषधियों का सत्व है तथा गोबर वनस्पतियों का सार तत्त्व है। गाय औषधियों की निर्माणशाला और रसायन शाला है। सुश्रुतचिकित्सा और अष्टांगसंग्रह के अनुसार गोमूत्र मनुष्यों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को १०४ प्रतिशत तक बढ़ाता है। गो चिकित्सा के लिए भारतीय वैज्ञानिकों को मिले अमेरिका के अधिकारपत्र से स्पष्ट है कि परम्परागत तरीके पूरी तरह विज्ञान सम्मत हैं।
गाय के गोबर में नीम की पत्तियां मिलाकर जली हुई त्वचा पर लेप करने से फायदा होता है। ताजा गोबर मलेरिया के परजीवी और टीवी के रोगाणु खत्म करता है। देशी नस्ल की गाय का दूध पौष्टिक होता है। इसमें मौजूद कुछ सूक्ष्म तत्त्व, जैसे साइको काइन्स, लवण इन्टरफैरान रोगों से लड़ने की क्षमता को बढ़ा देते हैं। दही से अतिसार और कोलेस्ट्राल पर नियंत्रण होता है। यह कैंसररोधी भी है गोघृत अत्यंत लाभकारी है। यह नेत्र रोगों में भी उपकारी है। तथा मेधा, सौन्दर्य , कांति और स्मृति भी बढ़ाता है। पंचगव्य से मन बुद्धि के विकार भी दूर हो जाते हैं।
गो विज्ञान अनुसंधान केन्द्र नागपुर ने अमरीका से दो पेटेन्ट प्राप्त किए हैं ; यू एस पेटेन्ट नं० ६४१००५९ और ६८९६९०७ । पंचगव्य के औषधीय गुणों का प्रमाणन जैसे भारत सरकार के उपक्रमों से हो चुका है। भारतीय गोंवश में सूर्यकेतु नाड़ी होने के कारण उसमें स्वर्ण का निर्माण होता है। इस तरह गाय के दूध के द्वारा स्वर्ण भी हमारे शरीर में जाता है। भारत में ४००० गोशालाओं में से १०० गोशालाएं औषधि बनाती हैं।
पर्यावरण महज नारा नहीं, जीवन शैली है। हवा, पानी और धूप को नैसर्गिक सौन्दर्य के साथ जोड़ने वाल विचार शुद्धता का मंत्र है और यह हमें सिखाता है गोवंश। गोमय या गोबर तो सोने की खान है। गाय के गोबर को जलाने से एक क्षेत्र विशेष का तापमान कभी एक सीमा से ऊपर नहीं जाने पाता। भोजन के पोषक तत्त्व नष्ट नहीं होते। धुआं हवा में मौजूद विषाणुओं को नष्ट करता है। गाय के गोबर और मिट्टी का मिश्रण घरो के लिए एटीसेपटिक का कार्य करता है।
घर किडे मकोडे, मक्खी&मचछर और सापो से मुक्त हो जाते है। गाय के गोबर की खाद से रासयिनक खाद और कीट नाशको से होने बाला प्रदूषण नष्ट किया जा सकता है।यह प्रभावी प्रदूषण नियन्त्रण है। गाय के गोबर से सौर विकिरण का प्रभाव नष्ट किया जा सकता है। गोबर का छिडकाव कूडा ढेर से बदबू भी हटा सकता है।
गोवर के कढे मे विषाणुनाशक तत्व होते है। यह प्लेग निवारक भी है। गोबर मे “एटिसेप्टिक तथा एटी''-रेडियोथर्मल गुण होता है। साथ ही १६ उपयोगी खनिज भी। कूढे -कचरे से खाद बनाने से लेकर सूखे तेल के कूये में पुनः तेल लाने के लिए गोबर का उपयोग किया जाता है। अगर देश के समस्त गोवंश के गोवर का वायोगैस मे सयत्र मे उपयोग किया जाए तो वर्तमान मे ईधन के रूप मे जलाई जा रही ६ करोड ८० लाख टन लकडी की बचत की जा सकती है। इससे वातावरण शुद्ध कर भू उर्वरता वढाता है। नीम से मिलकर जैव -कीटनाशक के रूप मे अत्यन्त फलदायी होता है।
देशी गाय अपनी निश्रवास से आक्सीजन छोडती है। जो मनुष्य एवं पर्यावरन को स्वस्थ रखती है । वर्तमान में वायु, जल, ध्वनि के साथ खाघ -प्रदुषण चिन्तनिय है। क्रषि -रसायनो के दूरगामी परिणामो मे गर्भपात, विकलागता की भी चर्चा हो रही है। बालो का सफेद होना ,लेगिक असन्तुलन ,प्रजनन प्रणाली मे विक्रेति एव कैसर के पीछे कीटनाशको का अनियन्त्रित उपयोग है। रासायनिक खाद का मात्र ३० प्रतिशत ही मिट्टी मे घुल पाता हैं। बाकी पत्थर भाति यथावत् रहकर मिट्टी को बंजर बनाता है। विश्व की ५२ प्रतिशत सें ज्यादा भूमि बंजर हो चुकी हैं।
ग्राम स्वराज गाय के कंधो पर टिका है। गाय और ग्राम पर्याय है। गोवंश -आघारित कुटिर उघोग गाँव से लोगो का पलायन रोक सकते हैं। गाय के चमडे का निर्यात व्यापार 6-5 करोड रू का है, जिसे गाँव के मजदूर, कारीगर आदि गोवंश की स्वाभाविक म्रत्यु से प्राप्त कर सकते हैं। म्रृत्यु के पश्चात गोवंश का चर्म तथा मृदा मे विसर्जित देह से ६ माह बाद समाधि खाद तेयार होती है।
पंचगव्य पर आधारित उद्योग हैं
टाइल्स, मच्छररोधी काइल, फिनाइल, कीटनाषक, डिस्टैम्पर, खपरैल, शेविंग क्रीम, फेसक्रीम, बर्तन साफ करने का पाउडर, दंतरक्षक, हर्बल शैम्पू उदर कैंसर, किडनी, श्वास, क्षय रोग आदि की दवांए।
मात्र गोबर से रेडिऐशन डिस्टैम्पर, १५ प्रकार की खाद, गमले, मूर्तियां फर्नीचर, नालीदार चादरें, रूफिंग मैटीरियल, खाद्य सुरक्षा और साबुन आदि वस्तुएं बनाई जाती हैं।
दो गायें, एक परिवार का पेट पाल सकती हैं। १ गाय औसतन ६ लीटर दूध देती है। गाय बछड़े को जन्म देती है। जो बड़ा होकर बैल बनता है। गाय मरणोपरान्त भी उपयोगी है। मशीनीकरण ने गोवंश की उपेक्षा की। गोबर, गोमूत्र से प्राप्त ऊर्जा , बैलों से प्राप्त ऊर्जा , उद्योग और सकल खाद्य पदार्थ गाय को एक सर्वथा लाभकारी उद्योग सिद्ध करते हैं। भारत की ४० करोड़ एकड़ भूमि पर पैदावार ताकि छोटे छोटे भूख्ण्डों के अनुकूल कृषिकर्म मात्र गोवंश ही कर सकता है। महात्मा गांधी और पं मदनमोहन मालवीय ने सम्पूर्ण गोरक्षा का अभिवचन दिया था। विनोवा भावे का यही संकल्प था।
राष्टीय स्वंयसेवक संघ के गोलवलकर ज़ी के महत्प्रयासो से सन् १९५२ में १.७५ करोड हस्ताक्षर तत्कालीन राष्टृपति को इस सन्दर्भ मे भेट किये गये थे । १९६६ मे हजारो संतो ने गोरक्षा आंदोलन मे अपनी बलि दीं।
वर्त्मान में सरकार निर्यात को बढावा देकर दूरगामी महाविनाश को आमन्त्रण है। गोवंश रक्षा यह दिव्य संक्लप पथ है। विजय रथ है राष्ट् का। चले गाँव की और ।चले प्रगति की और। स्वामी विवेकान्नद कहते है-'उठो जागो........गाय का खोया सम्मान वापस लाओ। उसे उसके सान्स्कृतिक पद पर प्रदिष्ठित करो। गोमाता और बर्बाद कृषि भूमि बचाओ। यह यात्रा है गाय, ग्राम, देश और विश्व को बचाने के लिए।
जिस गो की पीठ मे ब्रह्मा, गले मे विष्णु, मुख मे रुद्र, बीच मे देवता, रोम -रोम मे महर्षिगण, पू्छ मे नाग, खुराग्रो मे आठो पर्वत, मूत्र मे गंगादि नदियों, दोंनो नेत्रो में चन्द -सूर्य और स्तनो में वेद वसते हैं। वह गो पूरे संसार के लिए वरदायक है। आठो ऐश्वर्य लेकर देवी लक्ष्मी गाय के गोबर में निवास करती है। इस कथन में लक्ष्मी का गुदार्थ राष्ट्रलक्ष्मी तक पहुँचाता है। २१ वी सदी की हाई-टेक जीवन -शैली के प्रचंड आकर्षण से ग्रामीण युवा शहरो की और पलायन कर रहा हैं। गाँव के गाँव खाली हो रहे हैं। विगत वर्षो से लाखो किसानो द्वारा की जाने वाली आत्महत्या के पीछे स्वार्थी और देशद्रोही तत्व विद्यमान है। प्रक्रति से दूर जाने की सजा मिली है देश को।
१.५ लाख किसानो की आत्महत्या महज आँकडा नही है। १५० अरब रूपयो की पशुधन तस्करी भारत -वाग्लादेश सीमा पर हो रही हैं। आजादी के बाद लगभग ८० प्रतिशत गोवंश नष्ट हो चुका हैं। ऐसे मे कृषक और गोंवंश को संकटमुक्त करना, ग्राम-पलायन रोकना, अन्नदाता किसानो की पुनस्थापना रोकना, द्यर -द्यर मे गोपालन की अलख जगाना, रोगमुक्त, कर्जमुक्त, प्रदुषणमुक्त, और अन्नयुक्त ,उर्जायुक्त, मूल्य आघारित, र्धमपरायण, स्वाधीन, स्वाभिमानी और समृद्ध राष्ट् की आकृति मे रंग भरने के लिए, सत्य -शिव -सुन्दर उद्धेशयों को लेकर विश्वमंगल गो-ग्राम यात्रा का शुभारम्भ किया जा रहा है।
प्रवर्तक मंडल :योग गुरू वावा राम देव जी, श्री श्री रविशंकर जी,(आर्ट आफ लिविंग ), माँ अमृतानन्दमयी (अम्मा),जैन आचार्य मुनि महाप्रज्ञ जी ,दिगम्वर जैन आचार्य मुनि विद्यासागर जी ,पूज्य दयानन्द सरस्वती जी ,श्री विजयरत्न सुन्दर सूरीश्रवर जी ,पूज्य सदगुरू जगजीत सिंह महाराज,सदगुरू सामडोग रिनपोचे।
मार्ग दर्शन समिति : प.पू. श्री रमेश भाई ओझा ,प.पूं. स्वामी तेजोमयानन्द जी (चिन्मय मिश) ,प.पू.श्री देवामृतदास जी,प.पू श्री ब्रजहरिदास प्रभु जी (इस्कान), प.पू. सत्यमित्रतानन्द जी ,प.पू गोविन्ददेव गुरू जी ,प.पू.हंसदेव जी महाराज , प.पू. बौद्ध धर्म गुरू राहुल बोधि जी विद्याा विहार ,प.पू. श्री विष्णुपुरी जी महाराज ,(दक्षिण बंगाल),प.पू.श्री रामवालकदास महाराज जी , प.पू श्री विश्रेच्चतीरथ महाराज जी , प.पू वीरेन्द हेगडे,प.पू. युधिष्टर बाबा जी महाराज (शदानी दरबार), प.पू माधवप्रिय दास जी , प.पू. बालकृष्ण स्वामी जी, प.पू स्वामी सहजानन्द सरस्वती सिलीगडी,प.पू संजय महाराज पाचपोर ,प.पू श्री प्रकाश महाराज ,प.जंवजाल,प.पु.सुधांशु जी महाराज ,प.पु किशोर जी महाराज,प.पू.राजयश्सूरीश्रवर जी महाराज,प.पू.कमलेच्च मुनि जी महाराज , पं.पू.दत्तश्रणानन्द जी महाराज। उपाध्यक्षःश्री केसरीचन्द महेता,श्री राधेश्याम गोयनका,कलकत्ता,श्री हुक्मचन्दसावला। महासचिव : श्री दिवाकर शास्त्री। स्वरूप और लक्ष्य : निम्नाकिंत सूत्रो पर आचरण का संकल्प करना हैं।
१. ग्राम कृषि तथा किसान की पुनर्स्थापना के लिए गोसंर्वधन करना।
२.गाय को राष्ट्रीय प्राणी घोषित करना।
३.गोवंश रक्षा का केन्द्रिय कानून वनाना।
४. गोंवंशरक्षा हेतु सर्वधर्मीय जन प्रतिनिधि तैयार करना।
५.सम्पूर्ण भारत मे गोरक्षा हेतु हस्ताक्षर अभियान चलाना।
६.महामहिम राष्टृपति जी को विश्व के सबसे हस्ताक्षर अभियान के माध्यम सें करोडों हस्ताक्षर युक्त ज्ञापन सोपना।
७. भारतीय नस्लो का संरक्षण, संवर्धन एवं नस्ल -सुधार करना।
८. रासायनिक खाद एंव कीटनाच्चको पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना।
९.जैव आधारित कृषि की पुनर्प्रतिष्ठा।
१०.शहरो में अभ्यदान और गो-प्रेमी परिवारो का निमार्ण।
११.गोचर भूमि कर संरक्षण, विस्तार एंव घास बैंक का निर्माण करना। अतः गोचर प्राधिकरण बनवाना।
१२. इस पावन कार्य में स्वयं धन देना और समाज को प्रेरित करके धन संग्रह करना। यात्रा के सम्भावित परिणाम भारत के लाखों गांवों से निकलेगी उप यात्राएं, जो प्रमुख यात्रा से मिलेंगी। घर घर से चलेगा हस्ताक्षर अभियान। गोपालक का घर होगा ( अभय धाम ) । ७० प्रतिशत अभय धाम एवं गोप्रेमी परिवारों वाला ग्राम अभय ग्राम होगा। अभय ग्राम का पत्थर ग्राम में लगाया जाएगा।
१. ग्राम पलायन रूकेगा। ग्रामीणों को निज भूमि की ओर लौटने के लिए वातारण बनेगा।
२. किसानों की आत्महत्या रूकेगी । वे आत्मसम्मान का जीवन जिएंगें।
३. चिंतन का आधार बनेगी गो आधारित जीवन शैली।
४. कृषि आधारित कुटीर उद्योग बढ़ेंगें।
५. गोचर भूमि गायों को मिलेगी।
६. गोभक्ति से ग्रामोदय, ग्रामोंदय से राष्ट्रोदय, विश्व का मंगल ।
 
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