इस्लाम की तरह ईसाइयत भी एक सर्वसत्तात्मक राजनीति से प्रेरित मजहब है। इन्होंने सदैव विश्व के अन्य धर्मिक विश्वासों, राजनैतिक व्यवस्थाओं और संस्कृतियों को अपमानित, संहार और नष्ट करने का भरसक प्रयास किया है। इसके विपरीत चर्च ने यूरोप में हुए प्रथम और द्वितीय महायुद्धों की सदैव कटु आलोचना की है और चर्च मिलकर यह चाहते हैं कि भावी विश्वयुद्ध यदि हो तो वह एशिया और वरीयता क्रम में भारत में लड़ा जाए।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका में राजनैतिक युद्ध नीति का पुनर्नवीनीकरण किया गया और इस चिंतन में इस तर्क्र को प्रमुखता दी गई कि किसी भी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सीधे युद्ध करने की अपेक्षा अप्रत्यक्ष युद्ध बेहतर होगा तथा अन्य देशों को आर्थिक सहायता देकर, बिना युद्ध किए उनका अनुचित लाभ उठाया जा सके तो यह सीधे युद्ध में धन, सैनिक शक्ति और युद्ध सामग्री के व्यय से कहीं अधिक सस्ता पड़ेगा।
इसी चिंतन के आधर पर वेटिकन (रोमन-कैथोलिक चर्च और अमेरिका दोनों के माध्यम से चर्च ने पूर्व यू.एस.एस.आर. (रूस को अस्थिर करना आरंभ किया और इस उद्देश्य की पूर्ति में उन्हें आशातीत सफलता मिली है। अब चर्च का अगला तात्कालिक लक्ष्य भारत को अस्थिर कर, विभाजित व नष्ट करना है और इसके बाद अगला लक्ष्य चीन है।
चर्च भारत को पहले सांस्कृतिक और फ़िर राजनैतिक दृष्टि से अस्थिर एवं नष्ट करने की सदियों से लगातार कोशिश करता चला आ रहा है। अमेरिकी सी.आई.ए. प्रमुख ने एक बार इस तथ्य को स्वीकारा भी कि उन्होंने ईसाई मिशनरियों का राजनीतिक उद्दश्यों के लिए प्रयोग किया है।
एशिया की ईसाई कान्फ़्रेंस (सीसीए) ने अपना सातवाँ अधिवेशन (18 से 28 मई 1981), बंगलोर में आयोजित किया जिसमें प्रचारित 10वें पत्राक - “भारत में अछूतों का उत्पीड़न एवं हत्याएं और ईसाइयों का उत्तरदायित्व'' (अनु.ले.) में कहा गया है कि “सारे भारत में अंतरजातीय युद्ध फैल रहा है और हम संयुक्त राष्ट्र संघ और मानव अधिकार आयोग को एक प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का विचार कर रहे हैं ताकि हम दलितों के लिए एक अलग राज्य-दलितिस्तान की माँग के लिए संघर्ष कर सकें'' (पृ.1) पुनः यह भी कहा गया है कि “सीसीए स्वयं भी इस गंभीर समस्या के बारे में सोचे तथा यह अपने कार्यक्रम में अछूतों की मुक्ति को सबसे अधिक प्रमुखता दे जो कि आज विश्व की सबसे गंभीर समस्या है जिस पर चर्च को तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।''
इसीप्रकार सीसीए द्वारा कोलम्बो में आयोजित (28 अक्टूबर- 3 नवम्बर 1981) ‘धर्म की अछूतों की तरफ से बोलते हुए बंगलोर से प्रकाशित चर्च-प्रेरित ‘दलित वॉइस' के संपादक वी.टी.चन्द्रशेखर ने कहा, “(भारत में) मुसलमान, ईसाई और हिन्दू आपस में लगातार लड़ने वाली कौमें हैं''
चर्च की भांति अमरिका का प्रयास भी यही है कि रूस की तरह भारत को अस्थिर करके विभाजित कर दिया जाए जैसा कि अमरीकी राज्य विभाग द्वारा आयोजित गोष्ठी (16.7.1996) के वक्तव्यों और विस्कोन्सिन विश्वविद्यालय में आयोजित (5-6 नवम्बर 1996) गोष्ठी में व्यक्त विचारों से सुस्पष्ट है। सारे वक्तव्यों का सार यही था कि भारत एक व्यर्थ भौंकने वला दुष्ट कुत्ता है। इसे समाप्त कर दो (ऑर्गेनाइजर 22.10.96)। शायद अमरीका समझता है कि दुनिया के लोग अमरीका द्वारा रेड इंडियनों के साथ किए गए अमानवीय अत्याचारों को भूल गए हैं या उनकी कुटिल कूटनीतियों से अवगत नहीं हैं?
आज भी भारत में चर्च, समाज कल्याण के नाम पर, अनुसूचित एवं जनजातियों के स्वार्थी नेताओं से मिलकर अनेक पत्रा, पत्रिकाओं व प्रचार माध्यमों द्वारा अलगाववादी विष-वमन कर रहा है। निराधर आक्षेपों से भरा ‘दलित वॉइस' का साहित्य एक भयंकर अलगाववादी भूमिका निभा रहा है जो असह्य है। सच्चाई तो यह है कि चर्च ने धर्मान्तरण के अलावा दलितों के नाम पर व्यापक सामाजिक विघटनकारी अभियान चला रखा है जो 1947 से पूर्व पराधीनता से भी ज्यादा भयानक एवं दुष्परिणाम सिद्ध होगा।
चर्च की हिन्दू विरोधी नीतियां सुस्पष्ट हैं जैसे कि “वर्तमान नीतियों के बारे में हमारा चिंतन भारत में हिन्दू राष्ट्र की अवधरणा की निन्दा और इसे अस्वीकार करने को प्रेरित करता है।'' राजा बी मनिकम् (Our considerations of the prevailing political ideologies in India lead us to the outright condemnation and rejection of Hindu Nationalism" Christianity and the Asian Revolution Edited by Rajah B.Manikam, p.96)
चर्च की नीति, हिन्दू धर्म पर ही नहीं, बल्कि इस्लाम पर भी आक्रमण करने की रही है। क्रिश्चियन लिटरेचर सोसायटी लंदन से प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि “ईसाइयत की इस्लाम के प्रति नीति होनी चाहिए-आक्रमण, रक्षा नहीं, प्रेमासक्त भावना से आक्रमण, इस्लाम की सच्चाई के प्रति उदारतापूर्वक प्रशंसा, लेकिन फ़िर भी आक्रमण, पूरी तैयारी के साथ, तीव्र और योजनाबद्ध ढंग से आक्रमण'' (लखनऊ - 1911, जनवरी 23-28, 1911 में आयोजित गोष्ठी से पृष्ठ 10)।The policy of Christiandom with regard to Islam must be attack, not defence : Attack in all spririt of love and generous appreciation of truth in Islam, but still attack, vigorous concerted and all along the line." (Lucknow 1911, by General Conference of Missions to Muslims held at Luckhnow Jan. 23-28, 1911 p.10, pub. Christian Literature Society for India, London, 1911)
इस्लाम के राजनैतिक उद्देश्य :
इस्लाम की हिन्दू धर्म और भारत के प्रति यही नीति रही है कि किसी प्रकार अधिकांश भारत का इस्लामीकरण करके यहाँ इस्लामी राज्य स्थापित कर दिया जाए, और तब तक सेक्यूलरिज्म का नारा लगा कर सभी राजनैतिक पार्टियों में घुसकर अपने-अपने ढंग से इस्लामी हितों की रक्षा की जाए जैसा कि स्वयं मुस्लिम नेताओं के कुछ निम्नलिखित उदाहरणों से सुस्पष्ट है :-
1. 1921 में कांग्रेस अध्यक्ष हकीम अजमल खां ने कहा, “एक ओर भारत और दूसरी ओर एशिया माइनर, भावी इस्लामी संघ रूपी जंजीर के दो छोर की कड़ियां हैं जो धीरे-धीरे किन्तु निश्चय ही बीच के सभी देशों को एक विशाल संघ से जोड़ती हैं। (पुरुषोत्तम, मुस्लिम राजनीतिक चिन्तन और आकांक्षाएं, पृ. 51 से उद्धरृत)
2. मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने कहा “भारत जैसे देश को जो एक बार मुसलमानों के शासन में रह चुका है, कभी भी त्यागा नहीं जा सकता और प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है कि इस पर खोई मुस्लिम सत्ता को फ़िर से प्राप्त करने के यत्न करे।'' (नंदा-पैन इस्लामिज्म, इम्पीरियलिज्म एण्ड नेशनलिज्म, पृ 119)
3. मौलाना मौदूदी का कहना है कि “मुसलमान भी भारत की स्वतंत्राता के उतने ही इच्छुक थे जितने कि दूसरे लोग, किन्तु वह इसको, एक साधन, एक पड़ाव मानते थे ध्येय (मंजिल) नहीं। उनका ध्येय एक ऐसे राज्य की स्थापना था जिसमें मुसलमानों को विदेश अथवा अपने ही देश के गैर-मुस्लिमों की प्रजा बन कर न रहना पड़े। शासन दारुल-इस्लाम (शरीय शासन) की कल्पना के जितना भी संभव हो, निकट हो। मुस्लिम, भारत सरकार में, भारतीय होने के नाते नहीं, मुस्लिम की हैसियत से भागीदार हों। शर्त यह है कि उन्हें अपने बच्चों की शिक्षा को स्वयं तय करने का अधिकार हो। इस्लामी मजहबी और सामाजिक नियमों के पालन करने की स्वतंत्राता हो और गैर-इस्लामी (हिन्दू) रीति-रिवाजों का उन्मूलन करने की भी। उनसे अपने सहधर्मियों के विरुद्ध युद्ध करने को न कहा जाए।'' (डॉ. ताराचन्द, हिस्ट्री ऑफ दी फ़्रीडम मूवमेंट, खंड-3, पृ. 287)।
4. पाकिस्तान बनने के बाद भी मौलान हुसैन अहमद मदनी ने कहा, “हिन्दुस्तान, जब से इकतदारे इस्लाम (इस्लामी शासन) खत्म हुआ है तब से ही दारुल-हर्ब है।'' “जब सल्तनत हासिल न हो अहाद (मुसलमानों) का फरीजा सिर्फ यह होगा कि अपनी ताकत के अनुसार जद्दोजहद करें कि इस्लामी हुकूमत कायम हो। (पुरुषोत्तम, पृ. 54 से उद्धत)।
5. मदनी पुनः कहते हैं, ‘यदि वर्तमान में इतनी शक्ति नहीं कि एक सच्चा इस्लामी राज्य स्थापित किया जा सके, तब शरियत के अनुसार दो बुराइयों में से एक छोटी बुराई को स्वीकार करना जरूरी है, क्योंकि जिहाद का कर्तव्य पालन करने में और उसके अनुसरण करने में हथियार या युद्ध की पद्धति का कोई प्रतिबंध् नहीं है, बल्कि यह आवश्यक और उचित है कि चाहे जो भी हथियार या पद्धति हो, जो शत्रु की शक्ति या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा सके, उसका प्रयोग किया जाए। (मुत्ताहिदाह कौमियत और इस्लाम, पृ. 72)
6. इसीप्रकार जमीयत-इ-उलेमा के महामंत्री और भूतपूर्व सांसद् मौ. हिफजुर्रहमान लिखते हैं कि ‘सैयद अहमद बरेलवी से लेकर मौ. महमूद ऊलहसन तक के उलेमाओं के सभी आन्दोलनों का ध्येय भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना था और उन्होंने परिस्थितिवश ही गैर-मुसलमानों या कांग्रेस के साथ सहयोग किया था। परन्तु इस सम्मिलित संघर्ष में उन्होंने अपने वास्तविक ध्येय को यथावत् रखा और उसे कभी नजर अंदाज नहीं किया। (मोहम्मद सज्जाद-हकूमत-इ-इलाही की प्रस्तावना से)।
उपर्युक्त उदाहरणों से इस्लाम एवं भारतीय मुसलमानों के धर्मिक व राजनैतिक नेताओं की मानसिकता सुस्पष्ट होती है कि वे भारत को इस्लामी राज्य बनाना चाहते हैं, भले ही कुछ समय के लिए मुख्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए कांग्रेस व अन्य पार्टियों से समझौता करना पड़े। इसलिए अगस्त 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद दूसरी रणनीति बनाई गई और मुसलमान सभी भारतीय पार्टियों में घुस गए और लगातार भारत के इस्लामीकरण में सक्रिय हो गए हैं और कांग्रेस ने लम्बे काल तक सत्ता में बने रहने के लिए मुसलमानों का अंधाधुंध तुष्टीकरण करना प्रारंभ कर दिया। (देखिए हमारी पुस्तक ‘कांग्रेस राज में मुस्लिम तुष्टीकरण और हिन्दू')