Header

निर्मल धारा धर्म की
 

 



                     यह भारत की अपनी विद्या है। बहुत पुरातन विद्या है। परंतु दुर्भाग्य से विद्या हमारे देश से लुप्त हो गयी। फिर भी जब संतो की वाणी पढ़ते है तो लगता है भारत में अनेक संत ऐसे हुए जो भीतर ही भीतर विपश्यना करते है। उनकी वाणी पढ़े तो विपश्यना ही भरी है यद्यपि विपश्यना शब्द वे भी भूल गये और इस शब्द का कही प्रयोग नही किया। यह भी सच है कि वे इस विद्या को सिखा नहीं पायें। जब विद्या ही नष्ट हो गयी तो विधिवत ढ़ग से ,वैज्ञानिक ढंग से यह कैसे सीखी या सिखायी जाती? उनके अपने पूर्व जन्म के अभ्यास के फलस्वरूप उनमें स्वतः जाग गयी और उन्होने स्वयं तो यह काम किया होगा, पर लोगो को सिखा नही पायें। यह उनकी बाणी से स्पष्ट होता है। एक संत कहता है कि भाई यह जो कुदरत को कानून है, यह जो धर्म है, यह जो सत्य है, यह जो नियम है, यह जो ऋत है, यह जैसा बाहर है ठीक वैसा अन्दर है।बाहर और भीतर की सच्चाई में कोई भेद नहीं है। कुदरत का कानून जैसे मैरे पड़ोसी पर असर करता है, वैसे ही मुझ पर असर करता है। कुदरत का कानून जैसे सब पर असर करता है वैसे ही हम पर असर करता है। किसी का पक्षपात नही करता। सच्चाई एक ही है, नियम एक ही है, धर्म एक ही है, सार्वजनीन है। संत कहता है-
 
बाहर भीतर एको सच है, यह गुरूज्ञान बताई रे।
जन नानक बिन आपा चीन्हे, कटे न भ्रम की काई रे॥
जो बाहर है सो भीतर है। हर सदगुरू यही बात कहता है। गुरू ने यही बात बताई कि कुदरत का जो कानून मन के भीतर काम कर रहा है, बही बाहर काम कर रहा है। सच्चाई एक ही है। लेकिन हम उस सच्चाई को केवल मानकर रह गयें। गुरू महाराज ने कहा है, इसलिये मान रहे है। भगवान बुद्ध ने कहा, इसलिये मान रहे है। भगवान महावीर ने कहा इसलिये मान रहे है। हमारी गीता कहती है, बाईबील कहती है, कुरान कहता है, इसलिये मान रहे है। केवल मान कर ही रह गये। यह हमारा अपना ज्ञान नही है, पराया ज्ञान है।
पराया ज्ञान, सुना हुआ ज्ञान हमें प्रेरणा दे सकता है, मार्ग दर्षन दे सकता है, पर हमें विकारों से मुक्त नही कर सकता। वह पराया ज्ञान है। जब हम उसे अपनी अनुभूति पर उतारेगे तभी वह हमारा ज्ञान होगा। किसी ने हमें अपनी अनुभूतियों पर जागा हुआ ज्ञान हमें कहा और उसे सुनकर जब हम उसे अपनी अनुभूति पर उतारने लगे, तब वह हमारा ज्ञान हो गया । तब कल्याण हो गया।
किसी की साखी शब्द बन गये। संतो की साखी 'सबद' बन जाती है। क्या है साखी? उसने सत्य का साक्षात्कार किया। उसकी जो साक्षी है, उसने द्याब्दों पर उतारी। वही साखी सबद बनी। यह साखी हमारे लिये कल्याणकारि भी हो सकती है और अगर हम केवल ही बुद्धि-विलास कर के रह गये तो हानि कारक भी रह सकती है। केवल वाणी-विलास कर के रह गये कि हमारे संत ने ऐसा कहा, हमारे गुरू महाराज ने ऐसा कहा, हमारे बुद्ध ने ऐसा कहा, हमारी गीता ने ऐसा कहा, - उन्होने कहा और हमने मान लिया कि बड़ा अच्छा कहा तो हानि हो गयी। सारा जीवन खो दिया इस नशे में। लेकिन वही सबद जो किसी की साखी थी, जब हमारे लिये भी साखी बन गया, हमने भी उसका साक्षत्कार कर लिया तो हमारा कल्याण हो गया, मंगल हो गया। इसी को संतो ने कहा कि उसे जानो , केवल मानकर के मत रह जाओ।
इसी को हर महापुरूष कहता है कि मै जो कुछ कह रहा हूं, उसे केवल मान कर रह जाओगे तो तुम्हें कुछ नही मिलेगा। उसे जान लोगे, अपनी अनुभूति पर उतार लोगे तो सब कुछ मिल जायेगा। इसीलिए नानक कहता है कि इसी सच्चाई को जो बाहर और भीतर एक ही हेै उसे जन नानक - नानक जान गया है। कोरी बात नही करता। केवल किसी गुरू की कई हुई बात नही दोहराता। केबल शास्त्रों की बात नही दोहराता। जान गया है। और जान कर कहता है- बिन आपा चीन्हे- जब तक अपने आप को भीतर से नही पहचानोगें; अपने बारे में क्या सच्चाई है, उसे स्वंय अनुभूतियों से नही जानोगे; तो ' कटे न भ्रम की काई रे ' ,तब तक यह जो भ्रम है, यह जो भा्रंति है, इसमें सारा जीवन बीत जायेगा। यह कोई दूर नही होगी। यह अंधेरा दूर नही होगा। भ्रांति में ही पड़े रहोगे।
किसको ' मैं कहता हूं'? यह सारा शरीर स्कंध- 'मै-मै' 'मेरा-मेरा' क्या सचमुच 'मैं' है? क्या यह सचमुच मेरा है? क्या यह सचमुच मेरी आत्मा है? किसी ने कहा''नही ,यह तू नहीं है, यह तेरा नही है, यह तेरी आत्मा नही है।'' ऐसा किसी ने कहा और मेने मान लिया। मैने जाना तो नही न? इसी सच्चाई को जानेगे, अनुभूतियों के स्तर पर जानेगें, कि क्या है यह सारा शरीर स्कंध जिसे मै-मै, मेरा-मेरा किये जा रहा हूं। इसके प्रति कितना गहरा तादात्म्य स्थापित कर लिया । कितना चिपकाव पैदा कर लिया। उसके प्रति कितनी बड़ी आसक्ति पैदा कर ली और उस आसक्ति के कारण कितना तनाव पैदा कर लिया, कितनी अंषान्ति पैदा कर ली, कितनी पीड़ा पैदा कर ली। आखिर यह मै है क्या? क्या प्रपंच है इस शरीर का?
इसी प्रकार यह चित्त का प्रपंच जिसको -मै-मै' ,मेरा-मेरा किये जा रहा हूं ,आखिर यह क्या है? किसी की कही हुई मान लेने मात्र से बात समझ में नही आयेगी। इसीलिए संत कहता है आंखो से स्वयं देखो, स्वयं जानो तो भ्रम दूर होगा।
एक और संत कहता है-
तू कहता कागद की लेखी, मैं कहता आंखो की देखी।
मैं कहता सुलझावन वाली, क्यों तू रहा उलझाय रे' ॥
अनुभव करता है तो भ्रांतिया दूर होती है। सुलझने लगता है। केवल पुस्तकें पढ़ कर रह जाता है, केवल प्रवचन सुनकर रह जाता है तो उलझा रह जाता है। यही बात समझ में नही आती।
इस शरीर और चित्त के परे की अनुभूति ,इन सारी इंद्रियों के परे की इंद्रियातीत अनुभूति , भवातीत अनुभूति , लोकातीत अनुभूति ,जो नित्य है, द्यााष्वत है, धु्रव है, अमृत है उसका तो कहना ही क्या- यह जो इंद्रियों के क्षेत्र की भी सूक्ष्म अवस्थाओं की अनुभूतियों है, इन्हें भी शब्दो पर कोई कैसे रहेगा? शब्दों में इतनी शक्ति कहां कि मनुष्य की सारी अनुभूतियों को उतार सकें? भाषा की अपनी सीमा होती है। शब्दों की अपनी सीमा होती है। फिर भी लोगो को समझाने के लिए कहीं कुछ कहना पड़ जाता है तो कहते है, पर लोग समझ नहीं पाते ,तो उलझ जाते है।
बरसों बीत जाते है,संदिया बीत जाते है तो शब्दो के अर्थ बदल जाते है। ढाई हजार वर्ष पहले किसी महापुरूष ने किसी एक शब्द का प्रयोग किया। ढाई हजार वर्षों में एक भाषा बदल गये, शब्दो के अर्थ बदल गये। हम आज की भाषा के अनुसार उसका अर्थ करना चाहेगे तो उलझ जायेगें। भ्रांति ही पैदा होगी। मान लें कि शब्द नही बदला, उसका अर्थ भी नही बदला, तो भी उस महापुरूष ने अपने जिस धरातल पर एक बात कही, उसे जिस प्रकार का अनुभव हुआ और जिस अनुभूति के लिये उसने उस शब्द का प्रयोग किया, हम उस धरातल पर पहुचे ही नही। हम तो किसी भिन्न धरातल पर खड़े है,फिर भला उसकी बाणी को कैसे समझेगे? भ्रांति ही पैदा होगी।
जब स्वयं को वही अनुभव होने लगेगा, तब बात समझ में आयेगी। अपने बारे में सच्चाई केवल अपनी अनुभूतियों से जानी जा सकती है। दूसरें के बारे में क्या सच्चाई है,इसको हम बौद्धिक स्तर पर जान सकते है। पंरतु बौद्धिक स्तर पर जानी हुई बात सीमित सच्चाई के लिये होती है। इसीलिए संत कहता है- कोनो सुनी सो झूठ सब, आंखो देखी सच'। बात वही है। कान से सूनी है तो हमारे लिये झूठ है, एकदम झूठ है क्योंकि हमने आंख से नही देखा ,हमने स्वयं अनुभव नही किया। वह व्यक्ति जो ये शब्द प्रयोग कर रहा है, अपने किसी अनुभव से कह रहा है। यदि वह अनुभव हमने नहीं किया तो हमारे लिए वह झूठ ही होगी। हम तो उसकी कल्पना ही करेगे-हमारे लिए वह झूठ ही हेगी। हम तो उसकी कल्पना ही करेगें-हमारे भीतर ऐसा एक नित्य ,शाश्वत, धु्रव सत्य है,बाकी सब प्रंपच ही प्रंपच है। हमने उसे कैसे जाना? जब तक हमने सारे अनित्य-क्षेत्र का स्वयं दर्षन नहीं किया , तब तक उसके प्रपंच को कैसे जानेंगें और उसे जाने बिना उसके परे उस नित्य के क्षेत्र को कैसे समझेगें? कल्पना ही तो करेगें और कल्पना करेंगें तो धोखे में पड़ जायेगे। इसलिए जिस व्यक्ति कों सच्चाई का दर्शन करना है उसे स्वयं अपने भीतर सच्चाई का स्वयं अनुभव करना होगा।
……………………………………और
Footer