लड़ते लड़ते बाबा दीप सिंह व उनक साथी अमृतसर की ओर बढ़ते जा रहे थे । तैमूर शाह की सेना गाजर मूली की तरह कटने लगी । अताई खान एक माना हुआ सूरमा था । वह बाबाजी से युद्ध करने लगा । दोनों योद्धाओं में घंटो युद्ध चलता रहा । अंत में दोनों के सिर पर एक साथ घातक प्रहार हुआ । अताई खान वहीं ढेर हो गया । भाई फतेह सिंह बाबा दीप सिंह के पास ही खड़ा था । उन्हें गिरता हुआ देखकर बाबाजी से बोला बाबाजी आपका वचन दरबार साहिब पहुंचने का था पर आप तो राह में ही बिछुड़ने लगे हैं ।
उसने यह कहा ही था कि दुनिया ने एक चमत्कार देखा जिसकी आज भी लोग कल्पना करके दांतो तले उंगली दबा लेते हैं । बाबाजी का सिर धड़ से अलग हो चुका था । फतेह सिंह के शब्दों ने जादू का सा असर किया । उन्होंने अपने बांए हाथ से अपने सिर को पकड़ लिया ।अपने दांए हाथ से वे अपना भारी खंडा चलाते रहे । राह में आने वाले शत्रुओं को वे गाजर मूली की तरह काटते जा रहे थे । यह अदभुत दृश्य देखकर मुस्लिम सेना भाग खड़ी हुई । जहान खां चीख पड़ा "यह क्या ?" ।" इनके तो कटे सिर भी लड़ते हैं "। कुछ समय के लिए उसके होशोहवास उड़ गए ।
बाबा दीप सिंह द्वारा अपने बाएं हाथ की हथेली पर अपना सिर रखकर दाएं हाथ से बिजली की तेजी से तलवार चलाते हुए देखकर पठान फौज में भगदड़ मच गयी । बांए हाथ में टिकाया हुआ मुस्कराता हुआ उनका चेहरा एसा दिखायी देता था जैसे उन#FF3333ुरादें पूरी हो गयी हों । उन्होंने अपनी प्रतिग्याअनुसार सैकड़ों शत्रुओं को यमधाम पहुंचाने के बाद श्री दरबार साहिब की परिक्रमा में पहुंच अपना सिर यों भेंट किया मानों माथा टेक रहे हों और फिर दंडवत करते हुए वहीं हमेशा के लिए लेट गए । यह घटना सन १७५७ की है ।
बाबा जी के शरीर का संस्कार चाटीविंड के बाहर किया गया । वहां पर उनकी शानदार यादगार "शहीदगंज बाबा दीप सिंह" कायम है । श्रद्धालुगण वहां अपने श्रद्धासुमन अर्पित कर देश धर्म के लड़ने मरने की अक्षय प्रेरणा पाते हैं ।