Header

दुर्बलता के वे क्षण
 

 



                    अरावली की पर्वत श्रेणियों में महाराणा प्रताप एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ में दर दर भटक रहे थे । अकबर के भय के कारण संगी साथी साथ छेड़ गए थे । दिल्ली की पूरी सल्तनत ही उनके पीछे हाथ धोकर पड़ा गयी थी । अपने भी पराए बन गए थे । एक कंदरा से दूसरी कंदरा में वे छिपते घूमते । चप्पे चप्पे में मुगल सैनिक उन्हें खोजते फिरते । कई बार तो ऐसे भी क्षण आ उपस्थित होते कि अधपके भोजन को चूल्हे पर वहीं छोड़कर अन्य आश्रय स्थल की ओर भागना पड़ता ।
 
राणा प्रताप तो कष्ट सहिष्णु थे । वज्र जैसा था उनका शरीर । किन्तु महलों में रहने वाली, मखमली गद्दों गलीचों पर चलने वाली महारानी और छोटे छोटे बच्चों को तो अभ्यास था नहीं पैदल चलते चलते उनके पैरों में छाले पड़ गए थे । कुछ जंगली भील ही बचे थे उनके आश्रय दाता । मेवाड़ा के निष्ठावान राजपूत व सरदार तो तितिर बितर हो गए थे । वे राणा की संपूर्ण गतिविधियों से अलग थलग पड़ गए थे । मेवाड़ का सूर्य मुगल साम्राज्य के ग्रहण से ग्रस्त हो गया था । राणा पैसे पैसे को मोहताज थे । अभाव में कहां से सेना ?उनके लिए अस्त्रों शस्त्रों का जुगाड़ कैसे करते ? उनको ढांढस बंधाने वाली थी एक मात्र उनकी सहधर्मिणी । प्रिय । साहस न छोड़ो । आज नहीं तो कल अवश्य ये संकट के बादल छंटेगे । तुम तो राजपूत हो । मैं तुम्हारे साथ हूं ।जब मैने आशा नहीं छोड़ी तो वीरपुत्र को यह निराशा कैसी ? वह उन्हें ढांढस बंधाए रखती थी । कुछ भील अवष्य ऐसे थे जो उनके साथ कटने मरने को सदा तत्पर रहते थे । किन्तु मुट्ठी भर इन निहत्थों से क्या होता ? कभी कभी तो राणा का साहस भी टूटने लगता । पर पत्नी और भील साथियों की संकल्प शक्ति उनमें नवचेतना का संचार कर देती ।
रात्रि का समय ।प्रताप सिंह का पूरा परिवार एक गुफा में सोया हुआ था । उनकी आंखों में नींद कहां ? दुष्चिन्ताओं ने मन मस्तिष्क को आ घेरा था । बस । आंखे मूंदे चुपचाप पड़े थे । ओह कैसे दुर्दिन थे वे ? जिसकी तूती सारे राजस्थान में बोलती थी उसकी यह स्थिति कि उसके छोटे छोटे बच्चों को भरपेट भोजन भी नसीब नहीं । यकायक उनकी दृष्टि एक ऊदविलाव पर जा पड़ी । उसके मुंह एक रोटी का टुकड़ा दबा हुआ था । वह उसे ले भागा था । महाराणा की अबोध बालिका जाग पड़ी थी । उसने भी बिलाव को भागते हुए देख लिया था । उसके भूख का सहारा भी एक मात्र वह रोटी । वह भी हाथ से जाती रही । वह बिलख कर रो पड़ी ।
उसकी चीख सुन राणा की विचार तन्द्रा टूट गयी । महारानी तो बालिका को चुप कराने में लगी थी बच्ची तो बच्ची ठहरी । मां उसे जितना चुप कराने का प्रयत्न करती वह उतना ही दहाड़ मार मारकर शोर मचाती रानी को चिन्ता थी कि बड़ी मुश्किल से पति को नींद आयी है किन्तु यह तो उनकी नींद को ही उचाट देना चाहती है । दो एक थप्पड़ भ जड़ दिए थे । उनकी रही सही नींद और भी गायब हो गयी थी । वह दिन ऐसा बीता था कि किसी को भी भोजन के दर्शन नहीं हुए थे । राणा और महारानी तो भूख की ज्वाला को सहन कर सकते थे किन्तु बच्ची के तो यही दिन खाने पीने के थे । एक भील सांयकाल जंगली घास लेकर के आया था । महारानी ने उसकी ही रोटी बनाई थीं बच्ची तो भूख से रो रोकर सो गयी थी शेष सभी लोग आधा खाकर सो गए थे बच्ची के लिए आधी रोटी का टुकड़ा अलग निकालकर रख दिया गया था । उसकी को लेकर वह बिल्ली भागी थी । राणा करवटें बदल रहे थे उसी समय बालिका की आंखे खुल गयी थी । मेली लोटी लोटी कहकर बालिका चिल्ला पड़ी । भूख से उसकी आंते जल रहीं थीं । राणा ने अपनी आंखो से वह सारा दृष्य देखा था । राणा प्रताप थे तो मनुष्य । कभी कभी तो भगवान का भी धैर्य भी चुकजाता है । अन्याय, उत्पीड़न, पाप और अधर्म का जब घड़ा लबालब भर जाता है , उसे कोई अन्य अवलम्ब नहीं दीखता तब उनका भी धैर्य भी टूट जाता है । उसको भी त्राण के लिए स्वयं अवतार लेना पड़ता है ।राणा प्रताप भगवान तो थे नहीं । उनके संयम का बांण टूट गया ।
उनके मस्तिष्क में तूफान खड़ा हो यगा । मन ने कहा । क्या तूने ही देश का ठेका ले रखा है ? क्या किसी का कोइ दायित्व नहीं है । जिस समाज की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए तू इस दुरावस्था को पहुंचा है उसने तेरे लिए क्या किया ? उसने तुझे क्या दिया ? दुख और दैन्य ही तो । आज तेरे बच्चों कोभोजन तक नसीब नहीं । स्वयं लाखों को खिलाने वाला तू दर दर भटक रहा है । वे विचलित हो उठे । उन्होने एक पत्रसम्राट अकबर को लिखा । उसकी आधीनता स्वीकार के सम्बंध में वह पत्र उन्होंने एक संदेष वाहक के द्वारा गुप्त रूप से अकबर के पासभिजवा दिया था । रानी को इसका पता तक न चला ।यदि उस समय उसको इसकी जानकारी मिल जाती ताके शायद वह लिखा न जाता । रानी को एक सप्ताह के पश्चात ही पता चल सका था ।
वह भी तब जब राणा के मुख से ये शब्द फूट पड़े थे , रानी मत घबरा । हमारे फिर से सुदिन आने वाले हें हमें हमारा सुख वैभव पुनः प्राप्त होगा । हमारे बच्चे अब दर बदर नही भटकेंगे । यह सुनकर रानी प्रसन्नता को कोई पारावार न रहा था । किन्तु जब उसे राणा के पत्र के सम्बंध में पता चला तो सन्न रह गयी । बड़ी चितिंत हो गयी।सहसा विश्वास ही नहुआ । राणा भी ऐसा पत्र लिख सकते है । अवश्य ही वह मजाक कर रहे होंगे । जब उसे निश्चित हो यगा तो वह फूट फूट कर रोने लगी । अति दुखित मन से बोली , सुख ऐष्वर्य तो मिलेगा राणा जी । किन्तु किस कीमत पर ।देश की अस्मिता का सौदा करके ।तुमको ही मुबारक हो यह सुख । मुझे तो रूखी सूख मंजूर है पर गुलामी की रोटी तोड़ना नहीं । राणा के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही वह उठी ।अपनी पुत्री को उनके सामने ले गाई । कमर से कटार निकाल ली । बेचारी बालिका सहमी सहमी टुकुर टुकर मां को निहार रही थी उसे क्या पता था कि क्या होने जा रहा है ?
बच्ची को सम्बोधित रकते हुए वह बोली मेरी लाली । अपनी मां को क्षमा कर दे । आज मेवाड़ को आवष्यकता है तेरे बलिदान की । ऐसी कोख को धिक्कार है । वह कोख किस काम कह जो वज्र ऐसे कठोर हृदय को देश धर्म से च्युत कर दे ? मैं मेवाड़ के महारणा के मोह बंधनो को अभी ही काटे देती हूं । बेटी तेरा यह बलिदान ही शायद राणा को सही राह दिखाए । उसके छुरी उठाई । महाराणा उसके मन्तव्य को समझ गए थे । उन्होंने झपटकर रानी के हाथ की कटार छलनी उनके मुख से निकल पड़ा रानी । तू धन्य है । में बड़ा ही भाग्यशाली हूं कि तुम जैसी स्वाभिमानी धर्मपत्नी मुझे मिली । तूने मेरी आंखे खोल दीं । विश्वास कर । अब में जीवन की अंतिम श्वासं तक मेवाड़ की स्वतंता के लिए लड़ता रहूंगा । महाराणा के मोह का जाल कटगया था । उसमें से तपकर निकला एक स्वाभिमानी देश भक्त व्यक्त्त्वि । राणा की दुर्बलता के वे क्षण तिरोहित हो गए थे ।
......वापिस
Footer