सुबह का दिन था । सूर्य देवता आकाश में दो हाथ ऊपर को चढ़ आए थे । हाड़ा सरदार गहरी निद्रा में था । उसके विवाह को हुए अभी एक सपताह भी नहीं बीता था ।हाथ में कंगन भी नहीं खुले थे । रानी स्वयं पति को जगाने आई थी । सज धजकर वह सामन खड़ी थी । हाड़ा सरदार जगा । उसके चहरे पर छायी नींद की खुमारी अभी भी नहीं उतरी थी । पति पत्नी में किसी बात पर हंसी ठिठोली चल पड़ी तभी दरवान ने आकर सूचना दी कि महाराणा का दूत काफी देर से खड़ा हुआ है । वह ठाकुर से तुरंत मिलना चाहता है । आपके लिए कोई आवश्यक पत्र लाया है उसे अभी देना जरूरी है ऐसा वह कहता है ।
असमय में दूत मे आगमन का समाचार । वह हक्का बक्का सा रह गया । वह सोचने लगा कि अवश्य कोई विशेष बात होगी । राणा को पता है कि वह अभी ही व्याह कर के लौटा है । आपात की घड़ी ही हो सकती है । उसने हाड़ी रानी को अपने कक्ष में जाने को कहा । मेवा । दूत का तुंरत लाकर बैठक में बिठाओ । मैं नित्यकर्म से शीघ्र ही निपटकर आता हू । हाड़ा सरदार दरबान से बोला जह जल्दी जल्दी में निवृत्त होकर बाहर आया । सहसा बैठक में बैठै राणा के दूत पर उसकी निगाह जा पड़ी । जोहार बंदगी हुई । अरे शार्दूल तु । इतने प्रातः कैसे ? क्या भाभी ने घर से खदेड़ दिया है ? सारा मजा फिर किरकिरा कर दिया । तेरी लई भाभी अवश्य तुम पर नाराज होकर अंदर गयी होगी । नई नई है न । इसलिए बेचारी कुछ नहीं बोली । अम्मा चार । ऐसी क्या आफत आ पड़ी था । दो दिन तो चैन की बंसी बजा लेने देते । मियां बीबी के बीच में दालात में मूसलचंद बनकर आ बैठै । । अच्छा बोलो राणा ने मुझे क्यों० याद किया है ? वह ठहाका मारकर हंस पड़ा । दोनों में गहरी दोस्ती थी । सामान्य दिन अगर होते तो वह भी हंसी में उत्तर दूता । शार्दूल स्वयं भी बड़ा हंसोड़ था । वह हंसी मजाक के बिना एक क्षण को भी नहीं रह सकता था किन्तु वह बड़ा गंभीर था । दोस्त हंसी छोड़ो । सचमुच बड़ी संकट की घड़ी आ पहुंची है मुझे भी तुंरंत इन्ही पैरों से वापिस लौटना है । यह कहकर सहसा वह चुप हो गया अपने इस मित्र के विवाह हम में बाराती बनकर गाया था । उसके चेहरे पर छायी गंभीरता की रेखाओं को देखकर हाड़ा सरदार का मन आंशकित हो उठा ।सचमुच कुछ अनहोनी तो नहीं हो गयी । दूत सकुचा रहा था कि इस समय राणा की चिट्ठी वह मित्र को दे या नहीं हाड़ा सरदार को तुरंत युद्ध के लिए प्रस्थान करने का निर्देश वह लाया था । उसे मित्र के शब्द स्मरण हो रहे थे । हाड़ा के पैरों के नाखूनों में लगे महावर की लाली के निशान अभी भी वैसे के वैसे ही उभरे हुए थो । नव विवाहित हाड़ी रानी के हाथों की मेंहदी भी तो अभी सूखी नहोगी । पति पत्नी ने एक दूसरे कोठी से देखा पहचाना नही होगा । कितना दुखदायी होगा उनका बिछोह ? यह स्मरण करते ही वह सिहर उठा । पता नहीं युद्ध में क्या हो ? वैसे तो राजपूत मृत्यु को खिलौना ही समझता है । अंत में जी कड़ा करके उसने हाड़ा सरदार कके हाथों में राणा राजसिंह का पत्र थमा दिया । राणा का उसके लिए संदेष था ।
वीरवर । अविलम्ब अपनी सैन्य टुकड़ी को लेकर औरंगजेब की सेना को रोको । मुसलमान सेना उसकी सहायता को आगे बढ़ रही है । इस समय बादशाह संकट में फंसा है ।मैं उसे घेरे हुए हूं । उसकी सहायता को बढ़ रही फौज को कुछ समय के लिए उलझाकर रखना है ताकि वह शीघ्र ही आगे न बढ़ सके तब तक मैं पूरा काम निपट लेता हूं । तुम इस कार्य को बड़ी कुशलता से कर सकते हो । यद्यपि यह बड़ा खतरनाक है ।प्राण की बाजी भी लगानी पड़ सकती है । मुझे तुम पर भरोसा है । हाड़ा सरदार के लिए यह परीक्षा की खड़ी थी । एक ओर मुगलों की विपुल सेना और उसकी सैनिक टुकड़ी अति अल्प । राणा राजसिंह ने मेवाड़ के छिने हुए क्षेत्रों को पुनः मुगलों के चंगुल से मुक्त करा लिया था । औरंगजेब के पिता शाहजहां ने अपनी ऐड़ी चोटी की ताकत लगा दी थी । वह चुप होकर बैठ गया था । अब शासन की बागडोर औरंगजेब के हाथों में आई थी । राणा से चारूमति के विवाह ने उसकी द्वेषाग्नि को और भी भड़का दिया था । इसी बीच में एक बात और हो गयी थी जिसने राजसिंह और औरंगजेब को आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया यह सम्पूर्ण हिन्दू जाति का अपमान था । इस्लाम को कुबूल करो या हिन्दू बने रहने का दण्ड भगतो । इसी निमित्त हिन्दुओं पर यह कहकर उसने दण्डस्वरूप जजिया लगाया था ।
राणा राजसिंह ने इसका डटकर विरोध किया था । उनका हिन्दू मन इसे सहन नहीं कर सका । इसका परिणाम यह हुआ कइ अन्य हिन्दू राजाओं ने उसे अपनेयहां लागू करने में आनाकानी की । उनका साहस बढ़ गया था । गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंकने की अग्नि जो मुंद पड़ गयी थी पुनः प्रज्ज्वलित हो गयी थी । दक्षिण में शिवाजी बुंदेलखण्ड में छत्रसाल, पंजाब में गुरू गोविंदसिंह मरवाड़ में राठौर वीर दुर्गादास मुगल सल्तनत के विरूद्ध उठ खड़े हुए था । यहां तक कि आमेर के मिर्जा राजा जयसिं और मारवाड़ के जसवंत सिंह जो मुगलसल्तनत के दो प्रमुख स्तम्भ थे । उनमें भी स्वतंत्रता प्रेमियों के प्रति सहानुभूमि उत्पन्न हो गयी थी ।
घर का भेदी लंका ढाए । औरंगजेब का सगा बेटा ही उसके लिए काल बन गया था ।मुगल सल्तनत का अस्तित्त्व ही दांव पर लग गया था ।अतः करो या मरोके अतिरिक्त उसके सामने कोई चारा न बचा । अतः एक बड़ी सेना लेकर उ सने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया था राणा राजसिंह ने सेना के तीन भाग किए थं । मुगल सेनाके अरावली में न घुसने देने का दायित्व अपने बेटे जयसिंह को सौपा था । अजमेर की ओर से बादशाह को मिलने वाली सहायता को रोकने का काम दूसरे बेटे भीमसिंह का था । वे स्वयं अकबर और दुर्गादास राठौर के साथ औरंगजेब की सेना पर टूट पड़े थे । सभी मोर्चो पर उन्हें विजय प्राप्त हुई थी ।बादशाह औरंगजेब की बड़ी प्रिय काकेशियन बेगम बंदी बना ली गयी थी । बड़ी कठिनाई से किसी प्रकार औरंगजेब प्राण बचाकर निकल सका था ।मेवाड़ के महाराणा की यह जीत ऐसी थी कि उनके जीवन काल में फिर कभी औरंगजेब उनके विरूद्ध सिंर न उठा सका था । यह बात अलग है कि औरंगजेब के जाली पत्र से भ्रमित होकर राजपूत अकबर का साथ छोड़ गए थे ।
किन्दु क्या इस विजय का श्रेय केवल राणा को था । या और को भी ? हाड़ा रानी और हाड़ा सरदार को किसी भी प्रकार से कम नहीं था । मुगल बादशाह जब चारों ओर राजपूतों से घिर गया था । उसकी जान के भी लाले पड़े थे । उसका बचकर निकलना दुष्कर हो गया था तब उसने दिल्ली से अपनी सहायताकों अतिरिक्त सेना बुलवाई थी । राणा को यह पहले ही ज्ञात हो चुका था । उन्होंने मुगलो सेना के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करनके लिए हाड़ा सरदार को पत्र लिखा थां ।वही संदेश लेकर शार्दूल सिंह मित्र के पास पहुंचा था । एकक्षण का भी विलम्ब न करते हुए हाड़ा सरदार ने अपने सैनिकों को कूच करने का आदेश दे दिया था । अब वह पत्नी से अंतिम विदाई लेने के लिए उसके पास पहुंचा था ।
केसरिया बाना पहने युद्धवेष में सजे पति को देखकर हाड़ी रानी चौंक पड़ी वह अचम्भित थी । कहां चले स्वामी ? इतनी जल्दी । अभी तो आप कह रहे थे कि चार छह महीनों के लिए युद्धसे फुरसत मिली हैआराम से कटेगी यह क्या ? आष्चर्य मिश्रित शब्दों में हाड़ी रानी पति से बोती । प्रिय । पति के शौर्य और पराक्रम को परखने के लिए लिए ही तो क्षत्राणियां इसी दिन की प्रतीक्षा करती हे। । वह शुभ घड़ी अभी ही आ गयी ।देष के शत्रुओं से दो दो हाथ होने का अवसर मिला है । मुझे यहां से अविलम्ब निकलना है। हंसते हंसते विदा दो । पता नहीं फिर कभी भेंट हो या न हो हाड़ा सरदार ने मुस्करा कर पत्नी से कहा । हाड़ा सरदार का मन आंशकित था ।सचमुच ही यदि न लौटा तो । मेरी इस अर्द्धागिनी नवविवाहिता का क्या होगां ? एक ओर कर्तव्य और दूसरी ओर था पत्नी का मोह । इसी अन्तर्द्वन्द्व में उसका मन फंसा था । उसने पत्नी को राणा राजसिंह के पत्र के संबंध में पूरी बात विस्तार से बता दी थी । विदाई मांगते समय पति का गला भर आया है यह हाड़ी राजी की तेज आंखो से छिपा न रह सका । यद्यपि हाड़ा सरदार ने उसे भरसक छिपाने की कोशिश की । हताश मन व्यक्ति को विजय से दूर ले जाता है । उस वीर बाला को यह समझते देर न लगी कि पति रण भूमि में तो जा रहा है पर मोहग्रस्त होकर । इसका पति विजयश्री प्राप्त करे अतः उसने कर्तव्य की वेदी पर अपने मोह की बलि दे दी । वह पति से बोली स्वामी जरा ठहरिए । मैं अभी आई । वह दौड़ी दौड़ी अंदर गयी । आरती थाल सजाया । पति के मस्तक पर टीका लगाया उसकी आरती उतारी । वह पति से बोली । मैं धन्य धन्य हो गयी ऐसा वीर पति पाकर । हमारा आपका तो जन्म जन्मांतर का साथ है। राजपूत रमणियां इसी दिन के लिए तो पुत्र को जन्म देती हैं अप जाएं । मै विजय माला लिए द्वार पर आपकी प्रतीक्षा करूंगी ।उसने अपने नेत्रों में उमड़ते हुए आंसुओं को पी लिया था । पति को दुर्बल नहीं करना चाहती थी । चलते चलते पति उससे बोला प्रिय । मैं तुमको कोइ सुख न सका बस इसका ही दुख है मुझे भुला तो नही जाओगी ? यदि मैं न रहा तो ............ । उसके वाक्य पूरे भी न हो पाए थे कि हाड़ी रानी ने उसके मुख पर हथेली रख दी । नाना स्वामी । ऐसी अशुभ बातें न बोलो । मैं वीर राजपूतनी हूं , फिर वीर की पत्नि भी हूं । अपना अंतिम धर्म अच्छी तरह जानती हूं आप निष्चिंत होकर प्रयाण करें । देश के शत्रुओं के दांत खट्टे करें । यही मेरी प्रार्थना है ।
हाड़ा सरदार ने घोड़े को ऐड़ लगायी । रानी उसे एकटक निहारती रहीं जब तक वह आंखे से ओझल न हो गया । उसके मन में दुर्बलता का जो तूफान छिपा था जिसे अभी तक उसने बरबस रोक रखा था वह आंखो से बह निकला । हाड़ा सरदार अपनी सेना के साथ हवा से बाते करता उड़ा जा रहा था । किन्तु उसके मन में रह रह कर आ रहा था कि कही सचमुच मेरी पत्नी मुझे बिसार न दे ? वह मन को समझाता पर उसक ध्यान उधर ही चला जाता । अंत में उससे रहा न गया । उसने आधे मार्ग से अपने विश्वस्त सैनिको के रानी के पास भेजा । उसको पुनः स्मरण कराया था कि मुझे भूलना मत । मैं अवष्य लौटूंगा । संदेषवाहक को आष्वस्त कर रानी न लौटाया । दूसर दिन एक और वाहक आया ।
फिर वही बात । तीसरे दिन फिर एक आया । इस बार वह पत्नी के नाम सरदार का पत्र लाया था । प्रिय मैं यहां शत्रुओं से लोहा ले रहा हूं । अंगद के समना पैर जमारक उनको रोक दिया है ।मजाल है कि वे जरा भी आगे बढ़ जाएं । यह तो तुम्हारे रक्षा कवच का प्रताप है। पर तुम्हारी बड़ी याद आ रही है॥ पत्रवाहक द्वारा कोई अपनी प्रिय निशानी अवष्य भेज देना । उसे ही देखकर मैं मन को हल्का कर लिया करूगा । हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में पड़ गयी । युद्धरत पति का मन यदि मेरी याद में ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे । विजय श्री का वरण कैसे करेंगे ? उसके मन में एक विचार कौंधा । वह सैनिक से बोली वीर ? मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशान दे रही हूं । इसे ले जाकर उ न्हें दे देना । थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर अपने वीर सेनापति के पास पहुंचा देना । किन्तु इसे कोई और न देखे । वे ही खोल कर देखें । साथ में मेरा यह पत्र भी दे देना । हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था प्रिय । मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी भेज रही हूं । तुम्हारे मोह के सभी बंधनों को काट रही हूं । अब बेफिक्र होकर अपने कर्तव्य का पालन करें मैं तो चली ............ स्वर्ग में तुम्हारी बाट जोहूंगी ।
पलक झपकते ही हाड़ी रानी ने अपने कमर से तलवार निकाल , एक झटके में अपने सिर को उड़ा दिया । वह धरती पर लुढ़क पड़ा । सिपाही के नेत्रो से अश्रुधारा बह निकली । कर्तव्य कर्म कठोर होता है सैनिक ने स्वर्णथाल में हाड़ी रानी के कटे सिर को सजाया । सुहाग के चूनर से उसको ढका । भारी मन से युद्ध भूमि की ओर दौड़ पड़ा । उसको देखकर हाड़ा सरदार स्तब्ध रह गया उसे समझ में न आया कि उसके नेत्रों से अश्रुधारा क्यों बह रही है ? धीरे से वह बोला क्यों यदुसिंह । रानी की निषानी ले आए ? यदु ने कांपते हाथों से थाल उसकी ओर बढ़ा दिया । हाड़ा सरदार फटी आंखो से पत्नी का सिर देखता रह गया । उसके मुख से केवल इतना निकला उफ् हाय रानी । तुमने यह क्या कर डाला । संदेही पति को इतनी बड़ी सजा दे डाली खैर । मैं भी तुमसे मिलने आ रहा हूं ।
हाड़ा सरदार के मोह के सारे बंधन टूट चुके थे । वह शत्रु पर टूट पड़ा । इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था कि उसकी मिसाल मिलना बड़ा कठिन है । जीवन की आखिरी सांस तक वह लंड़ता रहा । औरंगजेब की सहायक सेना को उसने आगे नही ही बढ़ने दिया , जब तक मुसगल बादषाह मैदान छोड़कर भाग नहीं गया था ।इस विजय को श्रेय किसको ? राणा राजसिंहि को या हाड़ा सरदार को । या हाड़ी रानी को अथवा उसकी इस अनोखी निशानी को ?