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रथी व रथी
 

 



                    भारतीय मनीषा अन्य सभी से विलक्षण है, क्योंकि यह संसार के धर्मो से परे आत्मतत्व जो अविनाशी, ज्ञान एवं आनंद स्वरूप है, को जानने का प्रयत्न करती है। उपनिषदों के अनुसार यह आत्मतत्व बहुत अद्भुत है। आत्मा सर्वत्र उपलब्ध होते हुए भी आश्चर्यजनक रूप से न तो यह दिखाई पड़ता है और न ही सुनाई पड़ता है और न ही यह ऐसा आत्मा के रूप में जाना जाता है। जो यह कहता है कि मैं जानता हूं कि मैं नहीं जानता हूं तो संभव है वह जानता हो और आत्मा को कहने योग्य, वर्णन योग्य न समझता हो। आत्मा तो केवल प्रत्येक-आत्मा अर्थात् देह, मन, बुद्धि, इंद्रियों से परे अपनी आत्मा के रूप में ही जाना जा सकता है। जहां ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान, तीनों एक ही हो जाते हैं अर्थात् यह कहना संभव नहीं होता कि मैं अपने से पृथक किसी आत्मा को जानता हूं। आत्मा का अनुभव स्वयं में स्वयं का अनुभव है। आत्मतत्व तक पहुंचने उसे अनुभव करने का उपाय भी है।
कठोपनिषद् के अनुसार उस तक पहुंचने के लिए शरीर ही रथ है, जिसका मनुष्य रथी है। बुद्धि अपने निश्चयात्मक गुण के कारण सारथी है। संकल्प/विकल्प करने वाला मन लगाम है। इंद्रियां ही अश्व हैं जो भिन्न-भिन्न विषय रूपी मार्गो में अनियंत्रित भागते हैं। जो पुरुष बुद्धि द्वारा निश्चय कर, शुद्ध संकल्पी मन द्वारा इंद्रियां (अश्व) उसे जन्म जन्मांतर तक संसार में भ्रमित कर दु:ख देती रहेंगी। केवल एक बार रथ को ज्ञानमार्ग पर डालने से रथी गंतव्य (आत्मा) तक नहीं पहुंच पाएग, क्योंकि अश्वरूपी इंद्रियां स्वाभाविक रूप से बार-बार विषय भोग रूपी मार्ग की तरफ भागेंगे। अत: रथ पर सदा नियंत्रण रखना होगा, ताकि वह ज्ञान मार्ग से विचलित न हो। इसलिए उपनिषद् कहती है कि जिसकी बुद्धि (सारथी) सदा स्थिर, मन (लगाम) सदासमाहित और इंद्रियां (अश्व) सदा नियंत्रित होते हैं वहीं आत्मा रूपी परमपद तक पहुंच पाता है। उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि हम केवल इंद्रियों को तृप्त करने को बाध्य नहीं हैं, वरन् अपनी बुद्धि विवेक से मन को सकारात्मक बनाकर इंद्रियों पर नियंत्रण रख सकते हैं और अपने जीवन को आत्मप्रकाश से आलोकित कर सार्थक कर सकते हैं। अत: बिना समय बरबाद किए हमें प्रयास प्रारंभ कर देना चाहिए।
 
दैनिक जागरण ३०-१२-२००९ से साभार
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