हम प्रत्येक आत्मा का आह्वान करें, उत्तिष्ठत ! जाग्रत ! प्राप्य वरन्निबोधत-उठो, जागो और जब तक लक्ष्य प्राप्त न कर लो कहीं मत ठहरो ।
उठो! जागो! दौर्बल्य के मोहजाल से निकलो, कोई वास्तव में दुर्बल नहीं है । आत्मा अन्नत, सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापी है । खड़े हो, स्वयं को
झकझोरो, अपने अन्दर व्याप्त ईश्वर का आह्वान करो। उसकी सत्ता को अस्वीकार मत करो । हमारी जाति पर बहुत अधिक निष्क्रियता बहुत अधिक
दुर्बलता और बहुत अधिक मोहजाल छाया रहा है और अब भी हैं
ऐ हिन्दुओ ! इस मोहजाल को उतार फेंको । इससे मुक्त होने का मार्ग वही है जो तुम्हारे पवित्र शस्त्रो में वर्णित है ।
अपने सच्चे रुप को स्वयं समझो और अन्य प्रत्येक को सिखाओ । सुप्त आत्मा को जगाओ ओर फिर देखो वह कैसे जगती है । एक बार जहां यह
सुप्त आत्मा को पहचान कर कार्यक्षेत्र में उतरी कि तुम्हारे पास प्रभुता,कीर्ति, शुचिता, ऋजुता और अन्य जो कुछ भीं श्रेष्ठ गुण हैं सब अपने आप
चले आयेंगें ।