काम में लग जाओ । तब तुम अपने अन्दर इतनी प्रचण्ड शक्ति का जागरण पाओगे कि उसे धारण करना भी तुम्हें कठिन जान पड़ेगा । अन्यों के
लिए किये गये अत्यल्प कार्य से भी आन्तरिक शक्तियों का जागरण होता है । यहां तक कि अन्यों के प्रति चिन्तन से भी शनैः शनैः हृदय में सिंह
की शक्ति का प्रादुर्भाव होता है । आवश्यक वस्तु है वैराग्य । वैराग्य के बिना काई भी अपने सम्पूर्ण अन्तःकरण को परोपकार में नहीं उड़ेल सकता ।
विरागी मनुष्य ही सबको समान दृष्टि से देखता है और सबकी सेवा में अपने को
लगा सकता है ।
अतः वैराग्य धारण करो। तुम्हारे पूर्वजों ने महान् कार्य करने के लिए संसार को त्याग दिया था। वर्तमान काल में भी ऐसे लोग हैं जो अपनी
व्यक्तिगत मुक्ति के लिए संसार से विरक्त हो जाते हैं । सब घातों को त्याग दो, यहां तक कि अपनी मुक्ति का विचार भी त्याग दो और दूसरों की
सहायता करो ।
कुछ समय के लिए अन्य सब देवताओं को अपनी दृष्टि से ओझल कर दो,हमारा अपना समाज, अहर्निश हमारी आंखों के
समक्ष प्रत्यक्ष है । सर्वत्र उसके हाथ है, और सब ओर उसके कान । वह सब ओर व्याप्त है । समझ लो कि
अन्य सब देवता सो रहे हैं । उन व्यर्थ देवताओं के पीछे तो हम दौड़े किन्तु इस देवता की, इस विराट् पुरुष की, जिसे हम अपने चारों ओर देख रहे
हैं क्यो न पूजा करें ? जब हम इसकी पूजा कर लेंगे तभी हम अन्य देवताओ की पूजा करने के योग्य होंगे ।
मुक्ति वही है जिसने अपना सब कुछ दूसरों के लिए त्याग दिया । किन्तु जो दिन-रात 'मेरी मुक्ति' का राग अलपाने में अपने मस्तिष्क को खराब
करतें हैं वे अपने और वर्तमान भावी कल्याण का नाश कर व्यर्थ ही इधर-उधर भटकते रहते हैं ।