स्वातन्त्र्य वीर सावरकर जी द्वारा लिखित प्रसिद्ध नाटक -संन्यस्त खड्ग'' अर्थात् शस्त्र और शास्त्र का यह एक उद्धरण है। आत्यन्तिक अंहिसा के प्रचार से पंगु तथा प्रतिकार शून्य बने हुए शाक्य राष्ट पर कोसलराज विद्युत्गर्भ ने आक्रमण कर उसे धूलिधूसरित कर दिया। ऐसी अवस्था में जिन शाक्य वीरों ने आत्यान्तिक अहिसां पाप है तथा आक्रामक अन्याय का प्रतिकार ही पुण्य है, इस आदर्श का परित्याग नही किया था, उनके अन्तिम जुझार सेना के सम्मुख -'शरण या रण' यह प्रश्न उपस्थित हुआ। ऐसी उस बुद्धकालीन ऐतिहासिक परिस्थिति में तत्कालिक विजय के हेतु न भी हो तो भी प्रतिशोध हेतु लड़ना यही एकमात्र कर्तव्य है इस विचार का प्रतिपादन करने वाला भाषण शाक्यों की समरसभा में उनका एक वीर सेनानी सुलोचन दे रहा है-
सुलोचन -विजय की आशा अब भले ही न रही हो , फिर भी शाक्यों के लिए एक आशा अभी भी शेष है, और वह है प्रतिशोध की । मृत्यु को टालना असम्भव है,परन्तु फिर भी एक बात भर सम्भव है और वह है -''मारते हुए मरना'' आप यह सोच सकते है कि मेरी यह धारणा विशुद्ध क्रोध की अन्ध प्रतिक्रिया भर है। हाँ, वह वैसी ही है। पर यह दलित क्रोध की प्रतिक्रिया ही उन्मादरूपी हाथी का अंकुश होती है। सर्पपुच्छ पर पैर पड़ते ही सर्प त्वरित उलटकर दंश करता है तथा स्वतः मृत्यु के मार्ग पर होने पर भी शत्रु को भी मरणोन्मुख बनाके छोड़ता है। विजय के हेतु नही , रूधिर-प्रज्ञान के हेतु नही, तो प्रतिशोध हेतु .....तथा सर्प की जाति इस प्रकार प्रतिशोध लेने वाली है ऐसा भय मानव मात्र को होने के कारण ही वह उसे उस प्रकार कुचलने का साहस नही करता जिस प्रकार बालक चीटी या झीगुर को हंसी-खेल में कुचल देते है। बाण के घात से घायल व्याघ्र भी केवल इस निराश प्रतिक्रिया के आवेश में छलांग मारकर मृगया के गले में अपने दांत गड़ाता है। वह व्याघ्र तो मर जाता है,फिर भी उस व्याघ्र का प्रतिशोधक प्रतिक्रिया का स्वभाव देखकर कोई ऐरा-गैरा व्यक्ति व्याघ्र की मृगया हेतु ही ऐसे ही हंसी खेल में नही चला जाता जैसे खरगोश की मृगया हेतु जाता है। वह चीटी भी क्या जीव? जब वह मनुष्य के पैर को काटती है तब वह अच्छे से जानती है कि इस प्रकार काटने से व्यक्ति बच नही सकती,पर वह बचने के लिए नही काटती है, अपितु इसलिए काटती है कि अपने को मारने वाले को कुछ ढण्ड मारने वाले को भोगना पड़ेगा । काटने वाली वह चीटी तो मर जाती है, परन्तु उसकी उस देशक्रिया का परिणाम यह होता है मनुष्य तो क्या पर सर्प भी कभी उसकी जाति को काटने वाली चीटियाँ की बाँबी से सहसा नही घुसता है। मधुमक्खियो की एक जाति एसी होती है कि उनका छत्ता गिरते ही वे मधु की चिंता छोड़ देती है और अपनी जाति की और मक्खियों का क्या होगा इसकी चिन्ता भी नही करती है, तो प्रत्येक मक्खी अकेली ही छत्ता गिरानेवाले का पीछा करते हुए दूर दूर गांवो तक चली जाती है तथा जब वह डंसती है तब उसका डंक उस मनुष्य की देह में इतनी दृढ़ता से घुस जाता है कि वह पापिस नहीं लौट सकता वह वहीं मर जाती है ,क्योंकि प्रतिशोध लेते हुए मरने का संतोष अपमानित जीवन के सन्तोष की अपेक्षा उसके लिए अधिक आनन्दमयी होता है। इसीलिए रेशम के कीड़ो की पूरी वस्ती में भी मनुष्य जितना भयभीत नही होता, उतना केवल एक मधुमक्खी से होता है। प्रकृति ने ही प्राणिमात्र के कोच्च के प्रतिशोध का यह जो डंक रखा है, उसमें यह दैवी उदेश्य होता है कि प्रतिशोध की यह प्रवृति आततायी आक्रमण को उसका पापी अपहरण सहसा पूर्णतः सस्ता नही पड़ने देती । इसी के परिणामस्वरूप ही वह आततायी कर्म करने वाला उतने निर्भय वेग से नहीं दौड़ता जितने वेग से वह प्रतिशोध के भय के न होने पर दौड़ा होता। शेष जगत् उस आततायी पीड़ा से उतने प्रमाण में अधिक सुरक्षित रहता है। इसीलिए यदि अब शाक्य राष्ट को विद्युततगर्भ पर व्याघ्र की भाति टूट पड़ना चाहिए। एक-एक शाक्य को कम से कम पाँच-पाँच क्रूरकर्मी कोसलों का अन्दन करते हुए,उन्हे दण्ड देते हुए, उनसे प्रतिशोध लेते हुए मरना चाहिए , जिससे अन्य छोट-छोटे प्राजको पर तो भविष्य में सशस्त्र छापा मारने का साहस यह विद्युतगर्भ नही करेगा।
- ''ऐसे अवसरों पर प्रतिषोंध केवल स्वाभाविक प्रतिकिर्या ही नही तो परउपकारी कर्तव्य भी है! अतएव आपके प्रश्न के लिए मेरा एक ही उत्तर है कि -शरण नही प्रतिशोध!''