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| विपश्यना
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| विपश्यना आज एक नया व अपरिचित शब्द नहीं है। यह हमारे देश की एक बहुत पुरानी साधना विधी है, जो कई बार लुप्त होकर पुनः प्रयोग में
आती रही है। लगभग 2500 वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध ने जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति और निर्वाण की प्राप्ति हेतु अनेक प्रकार की शारीरिक तमस्याएं
एवं मन को नियंत्रित करने की विधियों का प्रयोग किया, लेकिन जब उन्हें उनसे कुछ भी नहीं मिला तो अंत में जिस साधना विधि का सहारा लेकर
बुद्धत्व को प्राप्त किया, वह साधना विधि विपश्यना ही थी। बुद्ध के पांच से सात सौ वर्ष बाद तक यह विघी हमारे देश में प्रचलित रही और यहीं ये
इसका ज्ञान पङोसी देशों तक पहुंचा। लेकिन समय के चक्र के साथ कुछ ऐसा हुआ कि यह विघी एक बार फिर हमारे देश में लुप्त हो गई लेकिन
पङोसी देशों में गुरु-शिष्य परंपरा के सहारे यह सुरक्षित रही। |
| भारत में इसको फिर से प्रचलित करने का श्रेय श्री सत्यनारायणजी गोयनका को है, जो वर्ष 1969 से लगातार विपश्यना का ज्ञान देश के अनेक
केंद्रों के माध्यम से बांट रहे है। आज विपश्यना का प्रयोग भारत में ही नहीं, विश्व के अनेक देशों में होने लगा है।
‘‘विपश्यना’’ शब्द का अर्थ है, देखना। लौटकर देखना। जो जैसा है वैसा देखना, न कि जैसा दिखता है वैसा देखना। अगर इस समय मेरा चित्त
दिखता है वैसा देखना। अगर इस समय मेरा चित्त द्धेष से ग्रस्त है तो उसको ऐसा ही दिखना/देखना। विपश्यना यर्थाथ को देखने/दिखाने की प्रक्रिया
है। यह अंतर्मन की गहराईयों में जाकर आत्म निरीक्षण के द्धारा आत्म शुद्धि की साधना है। विपश्यना शील, समाधि में स्थिर होकर प्रज्ञा जागृत
करने का अभ्यास है। विपश्यना अनुभव करके जानने को कहते हैं, सुनी सुनाई बात पर विश्वास करने को नहीं। भगवान बुद्ध ने कहास आप स्वयं को
देखिए और अनुभव कीजिए। दूसरों के अनुभवों के आधार पर विश्वास न करें। |
| विपश्यना का किसी संप्रदाय विशेष से या मान्यता से कोई संबंध नहीं है। अगर कोई बौद्ध इसका अभ्यास करके अपने मन को विकारों को दूर कर
सकता है, तो हिंदू, ईसाई, मुसलमान भी कर सकता है। संसार के सभी प्राणियों की समस्याएं एक हैं और इन समस्याओं के निराकरण की विधि भी
कोई एक होगी जो सभी पर समान रूप से कार्य करेगी। राग, द्धेष, ईष्या, क्रोध आदि विकार अलग-अलग तो नहीं हो सकते। इनके प्रभाव सभी के
लिए समान होंगे। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि सभी ने विपश्यना का प्रयोग किया और अपने विकारों को मिटते देखा है।
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| विपश्यना साधना शांत बैठकर अपने श्वास के निरीक्षण से प्रांरभ होती है। श्वास के निरीक्षण से प्रारंभ होती है। श्वास जैसी आ रही है, जैसी जा रही
है, उसे देखना। उसे तेज या धीरे करने की आवश्यकता नहीं। प्राणायाम में हम श्वास की गति को बदलते रहते हैं पर विपश्यना में श्वास जैसा है, उसे
वैसा ही देखना। श्वास को देखने के साथ न किसी मंत्र का उच्चारण है, न हीं किसी विशेष आसन को चुनना होता है। इसमें न कोई पूजा है, न
पाठ, न अन्य कर्मकांड। श्वास का हमारे विकारों से गहरा संबंध है। जब-जब विकार जागते हैं हमारे श्वास की गति तेज हो जाती है। जैसे ही विकार
दूर हुए, सांस सामान्य हो जाती है। सांस को देखते-देखते हम विकारों को देख सकते है। इन्हें रहने से चित्त निर्मल होता है। |
| विपश्यना कहीं भी चलते हुए, ऑफिस में बैठे हुए, बस स्टॉप पर खङे रहते हुए, सोने के पहले, सुबह उठने के साथ ही पलंग पर की जा सकती है।
अगर दुर्भाग्यवश आप अस्वस्थ हो गए तो उस अवस्था के काल को भी आप साधना के लिए प्रयोग कर सकते हैं। अतः विपश्यना कभी भी कहीं भी
की जा सकती है। लेकिन अपनी नियमित साधना एक स्थान पर शांतिपूर्वक करें, यही श्रेष्ठ है।
विपश्यना एक सरल साधना विधि |
| http://blogs.ibibo.com/shailhimachali से साभार |
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